१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्वयतारकोपनिषत् [ २१७ मनसि चक्षुर्मध्यगतनीलज्योतिस्थलं विलोक्य अन्तर्दृष्ट्या निर- तिशयसुखं प्राप्नोति । एवं हृदये पश्यति । एवमन्तर्लक्ष्यलक्षणं मुमुक्षुभिरुपास्यम् ॥५॥ ॐ। अब अद्वयतारक उपनिषद का कथन करते हैं जो संन्यासी, जितेन्द्रिय तथा शम-दम आदि षट गुणों से युक्त साधकों के लिये है ॥ १ ॥ आंखें बन्द अथवा अधखुली रख कर अन्तर दृष्टि से भ्रुकुटियों के ऊपर के स्थान में "मैं चित् स्वरूप हूँ" इस प्रकार का भाव निरन्तर रखते हुये सच्चिदानन्द, तेज समूह रूप परब्रह्म की झांकी करने से परब्रह्म रूप हो जाता है ॥ २ ॥ जो गर्भ, जन्म, जरा, मरण, संसार आदि महान पापों से तारता है, उसे तारकब्रह्म कहा जाता है। जीव और ईश्वर को मायिक जानते हुए अन्य सबको 'नीति-नेति' कहते हुए जो कुछ शेष बचता है, वही अद्वय ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उसकी सिद्धि के लिये तीन लक्ष्यों का अनुसंधान करना उचित है ॥ ४ ॥ देह के मध्य में सुषुम्ना नाम की ब्रह्मनाड़ी पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाश वाली उपस्थित है, वह मूलाधार से आरम्भ होकर ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। इस नाड़ी के मध्य में करोड़ों बिजलियों के समान तेजवाली, मृणाल के सूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रसिद्ध है। इसका मन के द्वारा दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से छूट कर मुक्त हो जाता है। ललाट के ऊपर विशेष मण्डल में स्फुरित होने वाले तेज को तारक ब्रह्म के योग से सदैव देखता रहता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छेदों को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर फुत्कार का शब्द सुनाई देता है। उसमें मन को स्थित करके चक्षुओं के मध्य नीली ज्योति के स्थल को अन्तःदृष्टि से देखने पर अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार का दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्षणों का मोक्षाभिलाषी पुरुष को अभ्यास करना चाहिये ॥५॥