१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ
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अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २२३ अर्थ है अन्धकार और ‘रु’ का अर्थ है इसको रोकने वाला । अन्ध- कार को दूर करने से गुरु होता है। गुरु ही परमब्रह्म है, गुरु ही परम- गति है, गुरु ही पराविद्या है, गुरु ही परायण योग्य है, गुरु ही पराकाष्टा है, गुरु ही परम धन है ॥ १४-१८ ॥ वह गुरु उपदेश करने वाला होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है। इसका उच्चारण करने से संसार से छुटकारा हो जाता है, सब जन्मों के पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं, सब कामनायें पूरी हो जाती हैं, सब पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वही उपनिषद् का ज्ञाता है ॥१६॥ ॥ अद्वयतारक उपनिषद् समाप्त ॥