भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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उत्तरकाण्ड [ २३१ सक्ति रूप, चिन्मय और आनन्द से विदित होने वाला वही है। नाद, बिन्दु और कला---इन तीनों नेत्रों से ही जगत चेष्टायुक्त है ॥४॥ तीन अङ्ग, तीन शिखा और दो या तीन मात्राओं से उसकी आकृति विदित होती है। जब इस प्रकार अन्तर्ज्ञान हो जाता है, तब इस गूढ़ आत्मा का ज्ञान बाह्यरूप से भी होने लगता है ॥ ५ ॥ ब्रह्मसूत्रपदं ज्ञेयं ब्राह्मयं विध्युक्तलक्षणम् । हंसार्कंप्रणवध्यानमित्युक्तो ज्ञानसागरे ॥६ एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसागरपारगः । स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य सर्वदा ॥७ सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन तु । विषये गच्छति प्राणश्चेष्टते वाग्वदत्यपि ॥८ चक्षुः पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्वं शृणोत्यपि । अन्यानि खानि सर्वाणि तेनैव प्रेरितानि तु ॥६ स्वं स्वं विषयमुद्दिश्य प्रवर्तन्ते निरन्तरम् । प्रवर्तकत्व चाप्यस्य मायया न स्वभावतः ॥१० जगत के सूत्र रूप ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और हंस रूपी सूर्य का प्रणव सहित ध्यान करना चाहिये, यही ज्ञानियों का उपदेश है ॥ ६ ॥ इस तरह के ज्ञान की प्राप्ति होने से ही ज्ञान सागर के पार पहुंचा जा सकता है। स्वयं शिव और पशुपति ही सर्वदा साक्षी रूप हैं ॥ ७ ॥ वही शिव सब से मन को प्रेरित और नियमन करने वाला है, जिसके प्रभाव से मन विषयों में जाता है, प्राण चेष्टा करते हैं और वाणी उच्चारण करती है ॥ ८ ॥ उसकी प्रेरणा से ही नेत्र देखते हैं, कान सुनते है और अन्य सब इन्द्रियां भी