भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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उत्तरकाण्ड ] [ २३३ करण के विषयों से भिन्न हैं और इसलिये बिना तर्क और प्रमाण के उसे अपनी आत्मा से जानने का प्रयत्न करना चाहिए, उसी को यथार्थ में परमात्मा का ज्ञान हो सकता है। यह आत्मा ही परम प्रकाशरूप है, जब कि माया घोर तमरूप है ॥१४—१६॥ तथा सति कथं मायासम्भवः प्रत्यगात्मनि । तस्मात्तर्कप्रमाणाभ्यां स्वानुभूत्या च चिद्घने ॥१७ स्वप्रकाशैकसंसिद्धे नास्ति माया परात्मनि । व्यावहारिकदृष्ट्येयं विद्याऽविद्या न चान्यथा ॥१८ तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् । व्यावहारिकदृष्टिस्तु प्रकाशाव्यभिचारतः ॥१९ प्रकाश एव सततं तस्मादद्वैत एव हि । अद्वैतमिति चोक्तिश्च प्रकाशाव्यभिचारतः ॥२० इसलिए प्रत्यगात्मा और माया को एकता किसी प्रकार संभव नहीं। इस प्रकार तर्क, प्रमाणों और अनुभव से विदित होता है कि चैतन्य रूप, स्वयं प्रकाश परमात्मा में माया नहीं है। विद्या और अविद्या के विषय व्यवहारिक हैं, परमात्मा से उनका सम्बन्ध नहीं ॥१७-१८॥ तत्व की दृष्टि से यह सब मिथ्या है, केवल एक तत्व ही वास्तविक है । व्यवहारिक दृष्टि से भी जो भी कुछ जान पड़ता है वह भी उसी प्रकार का आभास है। इससे यह सब अद्वैत ही है और अद्वैत भी उस प्रकार के अभेद से कहा जाता है ॥२०॥ प्रकाश एव सततं तस्मान्मौनं हि युज्यते । अयमर्थो महान्यस्य स्वयमेव प्रकाशितः ॥२१ न स जीवो न च ब्रह्मा न चान्यदपि किंचन । न तस्य वर्णा विद्यन्ते नाश्रमाश्च तथैव च ॥२२