भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

[Header] २४६ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्

[Body] अन्त में किये जाने वाला अवभृथ ( एक स्नान विशेष ) कौन कौन हैं ? अर्थात् जैसे यज्ञ में उपर्युक्त सभी वस्तुयें अपेक्षित हैं वैसे ही इस शरीर यज्ञ के लिये भी ये अवश्य अपेक्षित हैं, फिर ये कहाँ हैं तथा कौन हैं ? ॥ २१ ॥ इस शरीर यज्ञ का आत्मा यजमान है, बुद्धि पत्नी है, वेद ही महा ऋत्विज है, अहङ्कार तत्त्व ही अध्वर्यु है, चित्त ही होता है, प्राण ब्राह्मणच्छंसी है, अपान प्रतिप्रस्थाता है, व्यान प्रस्तोता, उदान उद्गाता, समान, मैत्रावरुण, शरीर वेदि, नाक, अन्त, वेदी, सिर द्रोण कलश, पैर, रथ, दाहिना हाथ स्रुवा, बाँया हाथ घृतपात्र, कान आधार (प्रणिया प्रोक्षणीपात्र) आंख आज्यभाग, गर्दन धारा, तन्मात्राएँ [पाँच] पोता, पञ्चमहाभूत सदस्य, गुण प्रयाज अनुयाज, जीभ इडा, दांत ओष्ट सूक्तवाक, बालु शंयोर्वाक, स्मृति दया शान्ति अहिंसा, पत्नीसंयाज, ॐकार खम्भा, आशा रशना, मन रथ, काम ही पशु, काल ही कुशायें इन्द्रियां यज्ञपात्र, कर्मेन्द्रियां हवि, अहिंसा इष्टकायें, त्याग ही दक्षिण मृत्यु ही अवभृथ स्नान है । अर्थात् उपर्युक्त वस्तुओं में तत्तद् वस्तु की स्थिति समझ उन्हीं के अनुसार क्रियायें भी समझनी चाहिये । तभी यह यज्ञ पूरा फलदायक होता है [ मोक्ष की प्राप्ति का साधन होता है ] तथा सभी देवता इस शरीर में समाहित होते हैं ॥ २२ ॥ यदि किसी का शरीर काशी में छूटे अथवा यदि कोई ब्राह्मण इसे पढ़े तो एक ही जन्म से चित्त शुद्धि करने वाले ज्ञान तथा मोक्ष को प्राप्त करले ॥२३॥

॥ प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् समाप्त ॥

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