भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 256

२४८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत्

दूसरा भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ इसलिये साधक को पहले प्राण को जय करना चाहिये और इसके लिये मिताहार, आसन और शक्ति- चालन को करना चाहिये ॥ २ ॥ हे गौतम ! अब मैं तुझको इनके लक्षण बताता हूँ, उन्हें तू ध्यानपूर्वक सुन । सर्वं प्रथम स्निग्ध और मधुर आधार करना चाहिये तथा पेट के एक चौथाई भाग को खाली छोड़ देना चाहिये ॥ ३ ॥ इस प्रकार का भोजन भगवान के उद्देश्य से किया जाय, यही मिताहार है । आसनों में दो प्रकार के मुख्य हैं— पद्मासन और वज्रासन ॥ ४ ॥ दोनों जांघों पर एक दूसरे पैर के तलवों को सीधा रखने से पद्मासन होता है, जो सब पापों का नाश करने वाला है ॥ ५ ॥

वामाङ्घ्रिमूलं कन्धाधः अन्यं तदुपरि क्षिपेत् । समग्रीवशिरःकायो वज्रासमनमितीम् ॥६ कुण्डल्येव भवेच्छक्तिस्तां तु संचालयेद्बुधः । स्वस्थानादाभ्रुवोर्मध्यं शक्तिचालनमुच्यते ॥७ तत्साधने द्वयं मुख्यं सरस्वत्यास्तु चालनम् । प्राणरोधमधाभ्यासाहृज्वी कुण्डलिनी भवेत् ॥८ तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते । अरुन्धत्येव कथिता पुराविद्भिः सरस्वती ॥६ यस्याः संचालने नैव स्वयं चलति कुण्डली । इडायां वहति प्राणे बद्ध्वा पद्मासनं दृढम् ॥१०

बांये पैर की एड़ी को योनि स्थान में रखे और दाहिने की एड़ी उसके ऊपर रखे, गर्दन तथा शिर को समान और सीधा रखे तो यह वज्रासन होता है ॥ ६ ॥ कुण्डली ही मुख्य शक्ति है, ज्ञानी साधक उसको चालन करके दोनों भौंहों के मध्य में ले जाता है तो वही