भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

२५० ] योगकुण्डल्युपनिषत् जो कुण्डलिनी के समीप ही रहती है किंचित ऊपर की तरफ खींचे ॥ १३ ॥ इस विधि से अभ्यास करने पर कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में चढ़ने लगती है और प्राण भी स्वयं ही उस स्थान को छोड़कर सुषुम्ना में चलने लगता है ॥ १४ ॥ पेट को ऊपर की तरफ खींच कर तथा कण्ठ को संकोचन कर सरस्वती को चलाने से वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १५ ॥ सूर्येण रेचयेद्वायुं सरस्वत्यास्तु चालने । कण्ठसंकोचनं कृत्वा वक्षः स्यादूर्ध्वगो मरुत् ॥१६ तस्मात्संचालयेन्नित्यं शब्दगर्भां सरस्वतीम् । यस्याः संचालनैनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥१७ गुल्मं जलोदरप्लीहो ये चान्ये तुन्दमध्यगाः । सर्वे ते शक्तिचालेन रोगा नश्यन्ति निश्चयम् ॥१८ प्राणरोधमथेदानीं प्रवक्ष्यामि समासतः । प्राणश्च देहगो वायुरायामः कुम्भकः स्मृतः ॥१९ स एव द्विविधः प्रोक्तः सहितः केवलस्तथा । यावत्केवलसिद्धिः स्यात्तावत्सहितमभ्यसेत् ॥२० जब सरस्वती का चालन किया जाय तो सूर्य नाड़ी ( दाहिनी ) से वायु का रेचक करे, कण्ठ से संकोचन कर ले तो वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १६ ॥ इस प्रकार शब्दगर्भा सरस्वती का लगातार चालन करते रहना चाहिये । इसके चालन से योगी सब प्रकार के रोगों से छूट जाता है ॥ १७ ॥ गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट सम्बन्धी अन्य रोग शक्तिचालन से निश्चयपूर्वक नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आगे प्राण निरोध ( प्राणायाम ) को बतलाते हैं । देह में चलने वाले वायु को प्राण कहते हैं और जब वह स्थिर हो जाता है तब वह कुम्भक कहा जाता है ॥ १९ ॥ यह कुम्भक दो प्रकार का