१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [योगकुण्डल्युपनिषद् परमात्मनि लीनं तत्परं ब्रह्मव जायते । ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ॥२४ अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किंचिदवशिष्यते । ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत् ॥२५ अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योतिरूपकम् । प्रकाशयन्तमन्तस्स्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम् ॥२६ विज्ञानात्मा तथा देहे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिः । मायया मोहितः पश्चाद्बहुजन्मन्तरे पुनः ॥२७ सत्कर्मपरिपाकात्तु स्वविकारं चिकीर्षति । कोऽहं कथमयं दोष संसाराख्य उपागतः ॥२८ जाग्रत्स्वप्ने व्यवहरन्त्सुषुप्तौ क्व गतिर्मम । इति चिन्तापरो भूत्वा स्वभासा च विशेषतः ॥२९ अज्ञानात्तु चिदाभासो बहिस्तापेन तापितः । दग्धं भवत्येव तदा तूलपिण्डमिवाग्निना ॥३० परमात्मा में मिल जाने से वह ब्रह्मरूप हो जाता है । उस समय एक ऐसा अगाध और गम्भीर रूप हो जाता है जो न प्रकाश कहा जा सकता है न अन्धकार । तब केवल सत्स्वरूप एक अव्यक्त तत्व ही शेष रहता है। जैसे घट के भीतर दीपक की ज्योति रहती है ऐसी ही एक निर्धूम ज्योति अपने अन्तःकरण में प्रकाशित होती रहती है । इसी स्वरूप में उस कूटस्थ अव्यय रूप का ध्यान करना चाहिए ॥ २४-२६ ॥ आत्मा अपने मूल रूप में विज्ञानमय होता है, पर देह में आकर वह मायावश, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं को प्राप्त होकर विमोहित हो जाता है । कितने ही जन्मों के पश्चात् जब शुभ कर्म उदय होते हैं तब उसके भीतर अपने विकारों को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि मैं वास्तव में कौन हूँ और Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi