भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८१ आत्मा को नीचे की अरणी के रूप में ग्रहण करके प्रणव को ऊपर की अरणी बनावे । इन दोनों के मंथन रूप ध्यानाभ्यास से गूढ़ तत्व का दर्शन करे ॥ २२ ॥ ॐकार की ध्वनि के नाद सहित रेचक का अन्त होने पर नाद का लय हो जाता है। इस प्रकार का ध्यान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करे ॥ २३ ॥ गमनागमन में स्थित और गमनादि से शून्य ऐसे करोड़ों सूर्य की दीप्ति के सदृश्य, सबके हृदय में रहने वाले हंसात्मक ॐकार का जो दर्शन करते हैं वे निष्पाप हो जाते हैं ॥ २४ ॥ यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थिति प्रलयकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२५ अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम् । तस्य मध्यगतो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥२६ शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥२७ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः ॥२६ अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥३० सृष्टि, स्थिति और लय होने का कारण जो मन में है उसका जहाँ विलय होता है वहीं विष्णु का परमपद है ॥ २५ ॥ आठ दल और बत्तीस पंखुड़ियों का जो हृदय कमल है उसके मध्य में सूर्य और सूर्य के मध्य में चन्द्रमा स्थित है ॥ २६ ॥ चन्द्रमा के मध्य में