१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८३ और अग्नि का एक के ऊपर एक करके दर्शन करे। कमल के विकसित होने से सूर्य, चन्द्र, अग्नि का बोध होता है। इनके बीज को ग्रहण करने से स्थिर आत्म-स्थिति प्राप्त होती है ॥ ३४-३५ ॥ त्रिस्थानं च त्रिमागं च त्रिब्रह्मा च त्रयाक्षरम् । त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥३६ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥३७ यथै वोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः । तथै वोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८ अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम् । कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत् ॥३६ भ्रू मध्ये तु ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतस्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत् ॥४० तीन स्थान, तीन पात्र; तीन ब्रह्मा, तीन अक्षर, तीन मात्रा और अर्धमात्रा में जो इनको जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३३ ॥ तेल की धार के समान अविच्छन्न और दीर्घ घण्टानिनाद के सदृश्य विन्दु, नाद, कला से अतीत को जो जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार कमल की नाल से जल को खींच लिया जाता है, उसी प्रकार वायु को खींचकर योगी योग साधन करे ॥ ३८ ॥ सम्पुटित कमल को अर्धमात्रा रूप करके वायु को सुषुम्ना द्वारा खींचकर भ्रुकुटी स्थान में लय करे ॥ ३६ ॥ भौंहों के मध्य में ललाट स्थान में, जहाँ नासिका का मूल है, वहाँ पर अमृत स्थान है, वही ब्रह्म का महान् स्थान है ॥ ४० ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi