भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 293

ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८५ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥४६ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत् ॥५० तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृता ॥५१ उसके मस्तक में जो मणि के समान प्रकाश है उसे योगीजन ही जानते हैं । तप्त सुवर्ण के से वर्ण वाला और बिजली की धारा के समान सुप्रकाशित, अग्नि स्थान से चार अंगुल ऊर्ध्व और मेढ्र स्थान के नीचे स्वशब्दयुक्त प्राण स्थित है, जो स्वाधिष्ठान चक्र के आश्रय में रहता है ॥ ४६-४७ ॥ मेढ्र के मूल में स्वाधिष्ठान चक्र है। वहाँ मणि के तन्तु के समान वायु से पूर्ण शरीर है ॥ ४८ ॥ नाभिमण्डल में जो चक्र है वह मणिपूरक कहा जाता है । वहीं पर बारह आरा वाले महाचक्र में पुण्य-पाप का नियंत्रण होता है ॥ ४६ ॥ जब तक जीव इस तत्व को नहीं जान लेता तब तक उसे भ्रमते रहना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के आकार वाला कन्द है, उसी से बहत्तर हजार नाड़ियां निकली हैं, जिनमें से बहत्तर को मुख्य कहा गया है ॥ ५०-५१ ॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥५२ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहुरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥५३ एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिनां सदा । सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥५४ इडापिंगलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः । इडा वामे स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ॥५५