भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०६ भवति एवमक्षमालिकया जप्तो मन्त्रः सद्यः सिद्धिकरो भवती- त्याह भगवान गुह प्रजापतिमित्युपनिषत् ।।१६।। पुनः बोले—जो सांख्यादिक दर्शनों में छयानवे तत्व हैं तुम्हें नमस्कार है ( हो ) आप लोग इस माला में स्थित हो जपने वाले को वर देने वाले कामधेनु स्वरूप तथा ( जपकर्त्ता के विरोधों के नाशक होकर ) शोभित होवे ॥ ११ ॥ पुनः इस प्रकार बोले—इस ब्रह्माण्ड में जो शैव, वैष्णव, तथा शाक्त सैकड़ों तथा हजारों की संख्या में निवास करते हैं उन्हें नमस्कार हो वे सभी भगवान् ( शक्तिशाली ) कृपा करें तथा अनुमोदन करें ( समर्थन, आज्ञा ) करें ॥ १२ ॥ अन्त में ऐसा कहे—जो मृत्यु की जो उपजीव्य शक्तियाँ हैं उन्हें नमस्कार हो आप लोग इस नमस्कार से स्तुति से प्रसन्न हो इस अक्षमालिका को अपने उपासकों को सुख देने वाली करदें ॥१३॥ फिर इस मालिका में सर्वात्मकता (सर्वविधि पूर्णता) की भावना करके इसी भावना से पूर्ण मालिका (आधी माला) को पिरोकर पुनः शेष आधी पचास मणकों में उसी प्रकार आवृत्ति करके ( १०० पूरे हुये ) और पुनः शेष आठ मणकों में 'अ' क, च, ट, त, प, य, तथा श इस अष्टवर्ग को ( पूर्वोक्तक्रम से ) योजित करे । तब एक सौ आठ हो जाते हैं ( मेरु में तो वही पूर्वोक्त क्ष रहेगा ) इस प्रकार मालिका की योजना एक २ का उपहार ( पास में पिरो २ ) करके करे ॥ १४ ॥ अक्ष मालिका की स्तुति—करके बाद उठकर प्रदक्षिणा करके ओं भगवती मन्त्र मातृके ! अक्षमाले तुम सबको वश में करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है । हे मन्त्र मातृके ! अक्षमाले ! तुम सब की गति स्तम्भ करने वाली, उच्चाटन ( विक्षिप्तता, विनाशता ) करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है । हे मन्त्रमातृके ! अक्षमाले ! तुम सबकी मृत्यु स्वरूप तथा मृत्युञ्जय स्वरूपिणी हो और तुम सब की उद्दीप्त करने वाली