भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३२६ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अष्टादशामी कथिता हस्ताः शंखादिभिर्युताः । सहस्रान्तास्तथा तासां वर्णवाहनकल्पना ॥६ शक्तिसेनाकल्पना च ब्रह्मण्येवं हि पञ्चधा । कल्पितस्य शरीरस्य तस्य सेनादिकल्पना ॥१० ब्रह्मादीनां वाचकोऽयं मन्त्रोऽन्वर्यादिसंज्ञिकः । जप्ततव्यो मन्त्रिणा नैवं विना देवः प्रसीदति ॥११ क्रियाकर्मेज्यकर्तॄणामर्थं मन्त्रो वदत्यथ । मननान्त्राणनान्मन्त्रः सर्वं वाच्यस्य वत्त्वकः ॥१२ सोऽभ्यस्यास्य देवस्य विग्रहो यन्त्रकल्पना । विना यन्त्रेण चेत्पूजा देवता न प्रसीदति ॥१३ परमात्म रूप ब्रह्म देह-रहित, अवयव-रहित, अद्वितीय और प्राकृत है, परन्तु भक्तों के इच्छित कार्यों को सिद्ध करने के लिए वह आकार को प्रकट करता है। ॥७॥ परमात्मा के स्वरूप में स्थित देव- ताओं को ही पुरुष, स्त्री, शङ्ख, अस्त्र आदि के रूप में कल्पित किया गया है। भगवान के साकार विभिन्न अवतारों में दो, चार, छः, आठ, बारह, सोलह, अठारह हाथ तक वर्णित हैं । उनमें वे शंख चक्र आदि भी लिये रहते हैं और जब वे विश्व रूप धारण करते हैं तब तो हजारों हाथ होते हैं। उन सब रूपों के विभिन्न रङ्ग तथा वाहन आदि होते हैं। उनके लिये विभिन्न शक्तियों, सेनाओं और शस्त्रों की कल्पना होती है। इस प्रकार सूर्य, गणेश, दुर्गा, विष्णु आदि रूपों में पञ्चभौतिक देह तथा उनके अनुरूप विभिन्न प्रकार की सेना और अनुचर आदि कल्पित हुए हैं ॥ ८-१० ॥ वृक्षादि जड़ पदार्थ, चेतन शरीर तथा ब्रह्मा तक सभी का वाचक यह 'राम' मन्त्र है। इसका जैसा अर्थ है, वैसा ही गुण है। इस मन्त्र की दीक्षा लेकर निरंतर जप करने से भगवान् की प्रसन्नता प्राप्त होती है। साधक गण अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए मंत्र की Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi