भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३६ अपुत्राणां पुत्रदं च बहुना किमनेन वै । प्राप्नुवन्ति क्षणात्सम्यग्व धर्मादिकानपि ॥ ६६ इदं रहस्यं परममीश्वरेणापि दुर्गमम् । इदं यन्त्रं समाख्यातं न देयं प्राकृते जने ॥ ६७ ॥ इति ॥ बारह पंखुड़ी वाले कमल की केसरों में 'अ' से 'क्ष' तक के वर्ण वृत्ताकार में लिखे । उसके बाहरी भाग में फिर सोलह पंखुड़ियों का कमल बनाकर, केसरों में ह्रीं अङ्कित करे । उसकी सोलह पंखुड़ियों में एक-एक पर एक-एक अक्षर के कम से 'हूं' 'फट्' 'नमः' और द्वादशा- क्षर मन्त्र लिखना चाहिये । पंखुड़ियों की संधियों में हनुमान जैसे वीर पुरुषों के बीज मन्त्र लिखे । उसके बाहरी भाग में नाद बिन्दु से युक्त बत्तीस पंखुड़ियों का एक विशाल कमल बनावे । पंखुड़ियों पर नरसिंह मन्त्रराज के बत्तीस अक्षरों को क्रमपूर्वक लिखे । उन पंखुड़ियों में ही आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और सबके धारक वषट्कार का न्यास एवं ध्यान करना चाहिये । इस बत्तीस पंखुड़ियों वाले कमल के बाहरी भाग में भूपुर यन्त्र बनावे और उसके चारों ओर वज्र तथा कोणों में शूल अंकित करे । भूपुर को तीन रेखाओं से मिलावे, यह रेखायें सत्य, रज, तमगुणों की सूचक हैं । मण्डप में बने द्वार के समान इसमें भी द्वार बनाना चाहिये । भूपुर में राशि आदि बनाकर भूपुर यन्त्र को शेष भाग से युक्त करना चाहिये । भूपुर यन्त्र-लेखन के पश्चात् उसकी चारों दिशाओं में नरसिंह बीजमन्त्र और कोणों में बारह बीज मन्त्र लिखना चाहिये । अनुग्रह, इन्दु, नाद, शक्ति आदि से युक्ता क्षरों मन्त्र ही नरसिंह बीज मन्त्र हैं । यह मन्त्र शत्रुओं का नाश करने, ग्रह बाधाओं को शान्त करने और इच्छित सिद्धि प्राप्त कराने वाला है । अन्त्य वर्ण, अर्धीश, बिन्दु, नाद