१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३४७ तब उन मुनियों ने पुनः प्रश्न किया—"यह श्रीकृष्ण कौन हैं ? गोविन्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? स्वाहा कौन है ? यह सब कृपाकर हमें बतावें।" ब्रह्माजी बोले—"श्रीकृष्ण पापों का अपकर्षण करने वाले हैं। वही गोविन्द नाम से गो, भूमि तथा वेदवाणी के जानने हारे के रूप में प्रसिद्ध हैं। गोपीजन-वल्लभ अविद्या के निवारक और अन्तरङ्ग शक्ति- रूप ब्रज-वनिताओं में सब ज्ञानमयी विद्याओं और चौंसठ कलाओं का ज्ञान भरने वाले हैं। इनकी माया शक्ति स्वाहा है। यह सब परमेश्वर के ही रूप हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण नाम से परब्रह्म ही प्रसिद्ध हुये हैं। जो मनुष्य उनके इस रूप का ध्यान करता है तथा उनके अमृतत्व को प्राप्त कराने वाले नामों को जपता है, या उनका भजन करता अथवा गुणानुवाद गाता है यह अवश्य ही अमृतत्व को प्राप्त करता है। तब उन मुनियों ने पुनः पूछा—"ध्यान करने के योग्य श्रीकृष्ण का कैसा रूप है ? उनके नाम रूप अमृत का रस किस प्रकार चाखा जा सकता है ? उनका भजन किस प्रकार होता है ? हमें यह सब बात स्पष्ट बताइये।" ब्रह्माजी ने बताया कि "भगवान के जिस रूप का ध्यान करना चाहिये उसका वेष ग्वाल-बाल जैसा है। उनका वर्ण नवीन जलधर के तुल्य श्याम है, किशोर अवस्था है और दिव्य कल्पतरु के नीचे वे विराज- मान हैं। उनका सौन्दर्य अपूर्व है और गोप तथा गोपियों से चारों ओर से घिरे हैं। जमुना जल की लहरों के स्पर्श से शीतल वायु भगवान की सेवा कर रही है। ऐसे रूप का चिन्तन करने वाला भव-बन्धन से छुट- कारा पा जाता है" ॥ १-३ ॥ तस्य पुना रसनमिति जलभूमिं तु संपाताः । कामादि कृष्णायेत्येकं पदम् ॥ गोविन्दायेति द्वितीयम् । गोपीजनेति तृती-