भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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[Header] ३८० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्

[Main Text] यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि व्याप्नोति व्यापयति स्नेहो यथा पललपिण्डं शान्त- मूलमोतं प्रोतमनुव्यास व्यतिषिक्तो व्याप्यते व्यापयते यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा प्रजापतिः प्रजया संविदानः त्रीणि ज्योतींषि सचते सषोडशीं तस्मा दुच्यते महाविष्णुमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते ज्वलन्तमिति यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि स्वतेजसा ज्वलति ज्वालयति ज्वाल्यते ज्वालपते सविता प्रसविता दीप्तो दीपयन्दीन्यमानः ज्वल ज्वलिता तपन्वित- पन्तसंतपन्नोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणस्तस्मा- दुच्यते ज्वलन्तमिति ॥ यह सुनकर कर देवताओं ने प्रश्न किया—'नृसिंह भगवान् के लिए 'उग्रम्' क्यों कहा गया है ?' प्रसिद्ध प्रजापति ने इसका उत्तर दिया—'भगवान् नृसिंह अपनी महिमा से सब देवताओं, सब भूतों सब आत्माओं और सब लोकों को ऊपर उठाते हैं, वही उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं, वे ही उन्हें अपने में लीन कर लेते हैं। संसार पर दूसरों से अनुग्रह कराते और स्वयं भी करते हैं। इसीलिए उन्हें उग्र कहा जाता है। इस विषय में ऋग्वेद में कहा है, श्रुतियां जिनकी स्तुति करती हैं, उन्हीं परमेश्वर की स्तुति करो। वे हृदय रूप गर्त में हैं, नवीन तरुणाई से शोभाय- मान हैं, सिंह रूप से प्रकट होते हुए भी भक्तों के लिये विकराल नहीं हैं। सब पर कृपा करने के लिये वे सब स्थान पर तथा सब के समीप पहुँचते हैं। वे सन्तजनों पर कृपा और दुष्टों को नष्ट करने वाले हैं, इसलिए उग्र कहे जाते हैं। हे भगवान नृसिंह ! आप इस स्तुति से संतुष्ट होकर मुझ स्तोता को सुखी करो। आपकी भयङ्कर सेना हम पर आक्रमण न करे, वह कहीं अन्यत्र जाय । इस मंत्र में