१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८७ नतमस्तक होकर बोले- 'भगवान ! मंत्रराज आनुष्टुभ की शक्ति और बीज का हमें उपदेश कीजिये ।' इस पर ब्रह्माजी ने कहा- "भगवान की शक्तिभूता माया ही इस विश्व की रचना, रक्षा और विनाश करती है। इसलिए यह माया ही शक्ति है। इस माया को शक्ति रूप से जानने वाला ज्ञानी पापों से पार होता है और भव-सागर से तर कर अमृतत्व को प्राप्त होता है, और वह इस लोक में भी महान् सुख-समृद्धि का उपभोग करता है। ब्रह्मवादी जन सोचते हैं कि भगवान की माया शक्ति लघु दीर्घ अथवा प्लुत है ? यदि लघु है तो जो कोई इसे लघु जाने वह अपने सब पापों को उसके द्वारा भस्म कर देता और अमृतत्व को पाता है। यदि दीर्घ है तो जो कोई उसके इस रूप को जानता है वह महान् ऐश्वर्य प्राप्त करता हुआ अंत में अमर हो जाता है। यदि वह प्लुत है तो जो उसके इस रूप का ज्ञाता है, वह अत्यन्त ज्ञानी होता और अमृतत्व प्राप्त करता है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि- "हे माया रूप बिन्दुममय स्वर ! मैं इस भव-सागर से पार होने की कामना वाला हूँ तो साधन के निमित्त दीर्घ आयु भी प्राप्त करना चाहता हूँ। इस उद्देश्य से मैं भगवान की शक्ति श्री, लक्ष्मी शङ्कर भगवान की शक्ति अम्बिका, ब्रह्मशक्ति सरस्वती, स्कन्दशक्ति षष्ठी, इन्द्र-शक्ति इन्द्रसेना और ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली साक्षात् प्रकट विद्या-शक्ति का आश्रय ग्रहण करता हूँ । तुम सभी उपरोक्त शक्तियों के सहित मेरी रक्षा करो।' यह सभी प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं, इसलिए आकाश ही सब प्राणियों का आश्रयभूत है। उत्पन्न प्राणी आकाश से ही जीवन धारण करते और अपना देह त्यागते और आकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः आकाश को ही सम्पूर्ण विश्व का बीज मानना चाहिए। इस विषय में यह दृष्टांत है कि जो पुरुषोत्तम भगवान् अपने