१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें[३६८ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्
कई बारीक-बारीक डण्डे जुड़े रहते हैं उसे अर कहते हैं ) दूसरा भी चार ही अर वाला, तीसरा आठ, चौथा पांच, पांचवां भी पांच अर वाला छठा आठ अर वाला है। सो इस प्रकार छः ही नारसिंह चक्र होते हैं। यह पूछे जाने पर कि उनके नाम क्या हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया—पहला आचक्र, दूसरा सुचक्र, तीसरा महाचक्र, चौथा सकल लोक रक्षण, पांचवां द्यूतचक्र एवं छठा असुरान्तचक्र के नाम प्रसिद्ध है । तो ये छः नारसिंह चक्रों के नाम हैं । ये पूछने पर कि उसके तीन वलय ( वेष्टन ) कौन-कौन हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया पहला आन्तर, दूसरा मध्यम, तीसरा बाह्य । ये तीन ही वलय हैं। इनमें जो मध्यम बीज है वह नारसिंह गायत्री एवं जो बाह्य है वह मन्त्र है। आन्तर वलय कितने हैं ? यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा— आन्तर वलयों की संख्या छः है । नारसिंहम् पहले का, महालक्ष्म्यं का, सारस्वत तीसरे का, जिसका जो नष्ट देव हो वह चौथे का, प्रणव ( ओंकार ) पांचवे का, क्रोध दैवत छठे का नाम है। सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः आन्तर वलय हुआ करते हैं । अथ किं मध्यमं वलयम् । षड्वै मध्यमानि वलयानि भवन्ति । यन्नारं॑सिहाय तत्प्रथमस्य यद्विद्महे तद्द्वितीयस्य यद्व- ञ्रनखाय तत्तृतीयस्य यद्धीमहि तच्चतुर्थस्य यत्तन्नस्तत्पंचमस्य यत्सिंहः प्रचोदयादिति तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंह चक्राणां षण्मध्यमानि वलयानि भवन्ति ॥ अथ किं बाह्यं वलयम् । षड्वै बाह्यानि वलयानि भवन्ति । यदाचक्रं यादात्मा तत्प्रथमस्य यत्सुचक्रं यत्प्रियात्मा तद्द्वितीयस्य यन्महाचक्रं यज्ज्योतिरात्मा तत्तृतीयस्य यत्सकल- लोकरक्षणचक्रं यन्मायात्मा तच्चतुर्थस्य यदाचक्रं यद्योगात्मा तत्पञ्चमस्य यदसुरान्तकचक्रं यत्सत्यात्मा तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंहचक्राणां षट बाह्यानि वलयानि भवन्ति ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi