भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४०४ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् अर्थात् 'दक्षिणामूर्तिः' शब्द को तत्पश्चात् विसर्ग सहित अतर शब्द को अर्थात् 'अतरः' को और अन्त में तार अर्थात् 'ॐ' का उच्चारण करे। यह नवाक्षर मनु-मन्त्र कहलाता है। ९। (ध्यान) ऐसे आद्य भगवान् शंकर हमें भावबुद्धि प्रदान करें जो कि शुकदेव आदि मुनियों से घिरे रहते हैं तथा जिनका एक हाथ कल्याणमय अभयदान की मुद्रा में है तथा अन्य दो हाथों में जिन्होंने फरसा तथा (हिरण) हरिण धारण कर रखा है। एवं जिनका एक हाथ जांघ पर रखा है तथा जो बरगद के नीचे बैठे हैं जिनके शरीर पर बड़े-बड़े साँप घूम रहे हैं। साथ ही दूज के चांद से जिनकी जटा सुशोभित है एवं जो कि दूध के समान गोरे रङ्ग के हैं तथा जिनकी तीन आँखें हैं। १०। मन्त्रेण न्यासः— तारं ब्लूं नम उच्चार्य मायां वाग्भवमेव च । दक्षिणापदमुच्चार्य यतः स्यान्मूर्तये पदम् ॥११ ज्ञानं देहि पदं पश्चाद्वह्न्रिजायां ततो न्यसेत् । मनुरष्टादशार्णोऽयं सर्वमन्त्रेषु गोपितः ॥१२ भस्मव्यापाण्डुराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला- वीणापुस्तैर्विराजत्कमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णो मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्यालः कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥१३ मन्त्रेण न्यासः — तारं परां रमाबीजं वदेत् साम्बशिवाय च । तुभ्यं चानलजायां तु मनुर्द्वादशवर्णकः ॥१४ वीणां करैः पुस्तकमक्षमालां बिभ्राणमभ्रा भगलं वराढ्यम् । फणीन्द्रकक्ष्यं मुनिभिः शुकाद्यैः सेव्यं वटाधः कृत- नीडमीडे ॥ १५ ॥