भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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भृङ्गी नामक कीड़ा अन्य कीड़ों को पकड़कर जब अपने घर में बन्द कर देता है तब वह कीड़ा य के कारण निरन्तर उस भृङ्गी को ध्यान करने के कारण भृङ्गी जैसा ही बन जाता है)। ठीक इसी प्रकार निरंतर शिव का ध्यान करने वाले शिवयोगी शिव पूजा के मार्ग में तथा गुरु पूजा की विधि में निरंतर एक चित्त होने के कारण महेश्वर के पूजन से मुक्त हो जाते हैं । शिव लिङ्ग का अभिषेक करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । गुरु के अभिषेक से तथा महेश्वर के चरणामृत से जन्मों के पाप धुल जाया करते हैं । इन सब में प्रेम करना ही शिव से प्रेम करना है । इसकी तृप्ति ही शिवतृप्ति है, इनके समीप रहना ही (चिन्तनादि के द्वारा भी) परम पवित्र वास है । उनका निरसन शिव निरसन ही है । इस प्रकार का ज्ञानी हमेशा आनंदयुक्त रहा करता है । अतः शिव की शरण लेनी चाहिए । गुरु की शरण लेनी चाहिए । ॥ रुद्रोपनिषद् समाप्त ॥