१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः सुव- रोमिति दिग्बन्धः । हरि ॐ। गरुड़ सम्बन्धी ब्रह्मविद्या का उपदेश किया जाता है, जिस विद्या को ब्रह्मा ने नारद को, नारद ने वृहत्सेन को, वृहत्सेन ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को, भरद्वाज ने जीवत्काम शिष्यों को कहा (उन्हें प्रदान किया) नीचे लिखे विनियोग से जल छोड़ना चाहिये—'अस्या श्री महागरुड़ ब्रह्मविद्याया' --- --- •••विषविनाशार्थे विनियोगः । अब नीचे लिखे मन्त्रों से अङ्गन्यास करना चाहियेः— ॐ नमो--- --- •••अंगुष्ठाभ्यां नमः । श्री महागरुडाय--- •••तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय••• ••• ---मध्यमाभ्यां वषट् । श्री विष्णुवल्लभाय••• •••अनामिकाभ्याँहुम् । त्रैलोक्य परिपूजिताय••• •••कनिष्ठिकाभ्यां वोषट् । उग्रभयङ्कर••• --- •••करतल पृष्ठाभ्यां फट् । इसी प्रकार हृदय शिरशिखा कवच नेत्रादि न्यास करके वोषट् करना चाहिये । "भूर्भुवः स्वरोम्" इससे दिग्बन्धन करना चाहिये । ध्यानम् । स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् । प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुड हरिवल्लभम् ॥ १ ॥ अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः । तक्षकः कटिसूत्रं तु हारः कार्कोट उच्यते ॥ २ ॥ पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां सुबीजितम् । एलपुत्रक- नागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम् ॥ ४ ॥ कपिलाक्षं गरुमन्तं सुवर्णसदृशप्रभम् । दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नादाभरणभूषितम् ॥५॥