भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४७० ] सरस्वतीरहस्योपनिषत् स होवाचाश्वलायनः- अस्य श्रीसरस्वतीदशश्लोकमहामन्त्रस्य-अहमाश्वलायन ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीवागीश्वरी देवता । यद्वागिति बीजम् । देवीं वाचमिति शक्तिः । प्रणो देवीति कीलकम् । विनियोगस्तत्प्रीत्यर्थे । श्रद्धा मेधा प्रज्ञा धारणा वाग्देवता महासरस्वतीत्येतैरंगन्यासः ॥ ४ ॥ एक समय की बात है भगवान् आश्वलायन के निकट ऋषिगण गये और उनकी विधिवत् पूजा कर प्रश्न किया 'भगवन् ! जिस ज्ञान के द्वारा 'तत्' पदात्मक परमेश्वर का स्पष्ट बोध होता है, उस ज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हो ? आपको जिस देवता की उपासना द्वारा तत्त्व- ज्ञान की प्राप्ति हुई है, इसके सम्बन्ध में बताने की कृपा करिये ।' भगवान् आश्वलायन ने कहा- 'ऋषियो ! मैंने बीज मन्त्र सहित दस ऋचाओं वाली सरस्वती दशश्लोकी के द्वारा उपासना करते हुए परासिद्धि को प्राप्त किया है ।' ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया- 'हे श्रेष्ठव्रती महर्षे ? उस सारस्वत मन्त्र की उपलब्धि आपको किस ध्यान के द्वारा किस प्रकार हुई, जिससे आप पर भगवती महासरस्वतीजी का अनुग्रह हुआ है। हमारे प्रति भी उस उपाय को कहने की कृपा करें ।' इस पर उन प्रसिद्ध आश्वलायन ने कहा- 'इस श्री सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्र का ऋषि मैं ही हूँ। इसका छन्द अनुष्टुप, देवता वागीश्वरी और बीज यद्वाग् है। शक्ति 'देवीं वाचं' कीलक 'प्रणो देवी' है। इसका विनियोग श्री वागीश्वरी देवता के प्रीत्यर्थ है। अंगन्यास श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता और महासरस्वती इन नाम-मन्त्रों से किया जाता है ॥ १-४ ॥ नीहारहारघनसारसुधाकराभा

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