१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ ] [ बह्वृचोपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सैव पुरत्रयं शरीरत्रयं व्याप्य बहिरन्तरवभासयन्ती देश- कालवस्त्वन्तरासङ्गान्महात्रिपुरसुन्दरी वै प्रत्यक् चितिः ॥४॥ सैवात्मा ततोऽन्यदसत्यमनात्मा । अत एषा ब्रह्मसंवित्ति- र्भावाभावकलाविनिर्मुक्ता चिद्विद्याऽद्वितीयाब्रह्मसंवित्तिः सच्चि- दानन्दलहरी महात्रिपुरसुन्दरी बहिरन्तरनुप्रविश्य स्वयमेकैव विभाति । यदस्ति सन्मात्रम् । यद्भाति । चिन्मात्रम् । यत् प्रिय- मानन्दम् । तदेतत् सर्वाकार महात्रिपुरसुन्दरी । त्वं चाहं च सर्वं विश्वं सर्वदेवता । इतरत् सर्वं महात्रिपुरसुन्दरी । सत्यमेकं ललिताऽऽख्यं वस्तु तदद्वितीयमखण्डार्थं परं ब्रह्म ।॥५॥ पञ्चरूपपरित्यागादवरूपप्रहाणतः । अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् ॥ इति ॥६॥ देवी ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की और वही संसार की उत्पत्ति से पहले थीं । वह ही कामकला और शृङ्गारकला के नाम से प्रसिद्ध हैं । उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र का प्रादुर्भाव हुआ । उन्हीं से सारे मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएं और किन्नर उत्पन्न हुए, समस्त भोग सामग्री का कारण वही हुई । सब कुछ उन्हीं से सृजन हुआ । शक्ति से ही सब कुछ बना । मनुष्य तथा समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों ( अण्डज, स्वेदज, उद्भिज, जरायुज ) की उत्पत्ति उन्हीं से हुई, उन्हीं को अपरा शक्ति, शाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या, सादि विद्या, व रहस्यरूपा कहते हैं । वे ही वह अक्षर तत्व हैं जो प्रणव का प्रतिपादन करती हैं, प्रणव स्वरूपा हैं, प्रत्येक प्राणी की वाणी पर अधिष्ठित हैं । वे ही तीनों अवस्थाओं ( जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ) व तीनों प्रकार के शरीरों ( स्थूल, सूक्ष्म और कारण ) में व्याप्त हो रही हैं और वही उनको प्रकाशित कर रही हैं । वे देश, काल और वस्तु की सीमा के भीतर रहती हैं, परन्तु यह उन्हें स्पर्श नहीं कर सकते और वे प्रत्येक प्राणी में चेतना उत्पन्न करती Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi