१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६४ ] [ बह्वृचोपनिषत् हूँ" "ब्रह्म भी मैं ही हूँ" "आत्मा ब्रह्म है" यदि वाक्यों द्वारा उसी परम विद्या का विवेचन होता है । उसी पञ्चदशाक्षरवाली देवी के ही बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, बाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढ़ा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला, आदि नाम हैं। जिस विनाश को प्राप्त न होने वाले आकाश में सारे देवता विराजमान रहते हैं, उसी परम आकाश में ऋचाएँ अधिष्ठित हैं। जो उस परम आकाश को भली-भाँति समझने की चेष्टा नहीं करता, वह केवल ऋचाओं के पढ़ने से कुछ नहीं कर सकता। उसको भली प्रकार समझ लेने वाले ही उसमें सदा निवास करने का स्थान पा जाते हैं। ॥ बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥