१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६७ देवता श्री और अग्नि, बीज 'हिरण्यवर्णम्', शक्ति 'का सोस्मि' है । हिर- ण्यमयी, चन्द्रा, रजतस्रजा, हिरण्यस्रजा हिरण्या,हिरण्यवर्ण इन नामों को चतुर्थी विभक्ति में रखकर ओंकार से आरम्भ कर अन्त में नमः उच्चा- रण करता हुआ न्यास करे । फिर श्रीसूक्त के मन्त्रों से अङ्गन्यास करे फिर निम्न मन्त्र से ध्यान करे— 'अरुण वर्ण के कमलदल पर विराजमान, कमल-पराग की राशि के समान पीले रङ्ग वाली,वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा और दो हाथों में कमल- पुरुष-धारिणी, मणिमय कंकणों से अलंकृत, सब लोकों की माता श्री महालक्ष्मी हमें निरन्तर श्री से सम्पन्न बनावे' ॥१-४॥ तत्पीठम् । कर्णिकायां ससाध्यं श्रीबीजम् । वस्वादित्य- कलापद्मेषु श्रीसूक्तगतार्धर्चर्चा तद्वहिर्यः शुचिरिति मातृकया च श्रियं यन्त्राङ्गदशशं च विलिख्य श्रियमावाहयेत् ॥५॥ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । पद्मादिभिर्द्वितीया । लोकेशैस्तृ- तीया । तदायुधैस्तुरीयाऽऽवृत्तिर्भवति । श्रीसूक्तैरावाहनादि । षोडशसहस्रजपः ॥६॥ सौभाग्यरमै कार्कश्य भृगुतृच्दगायत्रीश्रिय ऋष्यादयः । शमिति बीजशक्तिः । श्रामित्यादि षडङ्गम् ॥७ ययाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्त्तस्वराभां शुभाभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भिरासिच्यमाना । रत्नौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियैः नः॥८। पीठ कर्णिका के भीतर साध्य कार्यं श्रीबीज लिखे फिर अष्टदल, द्वादशदल और षोडशदल वाले पद्मों पर भूवृत्तों के मध्य में श्रीसूक्त की