१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें५१२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ त्रिपुरोपनिषत् जो ऐसा जानने में असमर्थ हैं वे निष्काम कर्मयोगी जीवन पर श्रीचक्र को अपने वर्ण, आश्रम के अनुरोध से क्षीर आदि द्वारा तृप्त करते हुए समयापन किया करते है और शरीर समाप्ति पर विशाल स्वर्ग पीठ पर (श्रीपुर में) ज्ञान का अभ्यास करते हुए प्रलय तक रहते हैं तदनन्तर त्रिपुर रूप को परम धाम उसमें निवास करते हैं और कृतकृत्य हो जाया करते हैं ॥ ७ ॥ अब मूल विद्या को प्रकट करते हैं—काम अर्थात् ककार, योनि अर्थात् ए कामकजा = ईकार, वज्रपाणि = लकार, गुहा = ह्रींकार, हस = हकार तथा सकार मातरिश्वा = ककार, अभ्र = हकार, इन्द्र = लकार, पुनगुंहा = ह्रींकार, सकलाः = सकार, ककार, लकार, भयिया च = ह्रींकार ये पुरुची विश्वमाता एवं विशिष्ट रूप ये आदि मूल विद्या हैं जिनकी आत्मा ॐकार है ॥ ८ ॥ विरक्तो को आदि विद्या के ज्ञान का फल— मूल विद्या का जो छठा अक्षर 'ह' है वह शिव बीज सातवाँ 'स' शक्ति बीज, वह्नि सारथि अर्थात् 'क' कामेश बीज एवं शिवसम्पुटित शक्ति बीज है। इसी प्रकार इस आदि विद्या का 'ह-स-क' ये तीन मूला- क्षर वाणी के पांशु रूप में जप करते हुए शब्द स्पर्शहीन कालदर्शी सर्वज्ञ को अपने अतिरिक्त सब कुछ नहीं ऐसा जानकर, व्यष्टि समष्टि रूप जो प्रपंच कल्पक, अथवा अपने अतिरिक्त जीव, शिव, तत्कल्पनीय, व्यष्टि समष्टि प्रपंच समूह नहीं है ऐसा जानते हुए कामेश्वर ईश्वर को तुष्ट करते हुए योगी अमृतत्व की प्राप्ति कर लेते हैं ॥ ६ ॥ भक्तानुग्रह के लिए जो ऐसे रूप धारण किया करती है उसका ध्यान करके ही अपने-अपने स्वभाव के अनुसार योगी फल प्राप्त करते हैं। वह 'पुरमेकादशद्वारम्' इस श्रुति के आधार पर पुर = यानी स्वाविद्या- पद तथा उसका कार्यकलाप, रूप धारण करती है। अपिच 'ह-स-क' ये हृन्त्रीमुख = आदिविद्या सार रूप को धारण करती है। सूर्य की रेखा अर्थात् 'ईं ओं' ये जो स्वर मध्य हैं वह रूप भी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi