भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५२४ ] [ सीतोपनिषत् उनके चारों ओर खड़े हैं तथा ब्रह्मादिक उनकी स्तुति करते हैं। अणि- मादि ऐश्वर्यों से सम्पन्न लक्ष्मी रूपा सीता की कामधेनु वन्दना करती है। वेदशास्त्र भी देवरूप में उनकी स्तुति करते हैं। अप्सराएं और देवांगनाएं उनकी सेवा कर रही हैं। राका और सिनीवाली देवियां छत्र पकड़े खड़ी हैं, ह्लादिनी और माया चँवर डुला रही हैं तथा स्वाहा और स्वधा पंखा कर रही हैं। भृगु आदि महात्मा उनका पूजन कर रहे हैं। सूर्य और चन्द्र दीपक रूप में वहाँ प्रकाश कर रहे हैं। तुम्बरु और नारद आदि उनके गुणगान में व्यस्त हैं। वे महादेवी दिव्य सिंहासन पर स्थित अष्टदल कमल पर विराजमान हैं। वे ही सब कार्यों और कारणों की विधायिका हैं। उन्होंने दिव्य आभूषणों से अपने को अलंकृत किया हुआ है। वे देवताओं द्वारा पूजी जाती हुई प्रसन्न नेत्रों से अवस्थित वीर लक्ष्मी हैं। इस प्रकार भगवान् से पृथक् उनका ध्यान करना चाहिए।' ॥३७॥

॥ सीतोपनिषद् समाप्त ॥

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