भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पवित्र, सत्य से पवित्र माना जाता है, हो जाता है। उसे सभी देव जानते हैं। उसने सभी तीर्थों का स्नान कर लिया, तथा सभी यज्ञ भी कर चुका । उसने तो गायत्री के साठ हजार जप कर लिए । इतिहास तथा पुराणों के हजारों जप वह कर चुका । दस हजार ॐकार का जप वह कर चुका । वह पुरुष अपनी दृष्टमात्र से मनुष्यों की पंक्तियों को (हजारों मनुष्यों को) पवित्र कर देता है। सातवीं पीढ़ी तक के मनुष्यों को पवित्र कर देता है एवम् जो इसे पढ़ता है वह अमृतत्व को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है, ऐसा भगवान् हिरण्यगर्भ ने कहा है ॥७॥ देवा ह वै स्वर्गं लोकमायंस्ते देवा रुद्रमपृच्छंस्ते देवा ऊर्ध्वबाहवो रुद्रं स्तुवन्ति । भूस्तवादिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा शान्तिस्त्वं हुतमहुतं दत्त- मदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् । अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवा नमस्याम धूर्तेरमृतं मृत मर्त्यं च सोमसूर्यपूर्वजगदधीतं वा यदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं ग्राहं ग्राहेण भावं भावेन- सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण ग्रसति तस्मै महाग्रासाय नमः ॥ ८ ॥ देवता स्वर्ग लोक में आये तथा हाथ उठाकर रुद्र की स्तुति करते हुए उनसे पूछा (कहा) तेरा आदि भूः, मध्य भुवः, शिर स्वः है, तू विश्व- रूप है, तू ही एक ब्रह्म है। द्विविध, त्रिविध शक्तिहुत (होम किया गया) अहुत, दिया, न दिया, सर्वं (सब कुछ) असर्व, विश्व (संसार) अविश्व, किया न किया, पर, अपर परायण सब तू ही है। हम सोम पान अमृत होवें, हमें ज्ञान प्राप्त हो, हम देव आपको नमस्कार करते हैं, अमृत, मृत, मर्त्य, सोम, सूर्य, पूर्व संसार, अधीत या जो अक्षर (अविनाशी) प्राजा- पत्य, सौम्य सूक्ष्म है उसे ग्राह को ग्राह से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से ग्रसित करते हैं। उस महाग्रास को (ग्रसित करने वाले को) नमस्कार है ॥ ४ ॥ ॥ चतुर्वेदोपनिषद् समाप्त ॥

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