१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५३ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है । कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं, उसमें :प्रतिपादित देवता के गुण धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ठ काम्य-प्रयो- जनों की भी पूर्ति करते रहें, ऐसा अभिमत उपनिषद्कारों का रहा है । सूर्य, शिव, गणेश, नृसिंह, गरुड़, हनुमान, कृष्ण, राम, राधा, सीता, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, त्रिपुरा आदि देवी देवताओं की उपासना का उद्देश्य क्या है और उनका क्या प्रतिफल प्राप्त होता है,उसका वर्णन उन देवताओं के प्रयोजन से बने हुए उपनिषदों में हुआ है । यह देवपूजा विशेषतया लौकिक प्रयोजनों के लिये की जाती है । पीछे अध्यात्म-मार्ग पर चलते हुए साधक ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जाता है। देव-उपासना भी परमात्मा के एक रूप विशेष की ही पूजा है और उससे सीमित उद्देश्य की पूर्ति भी होती है । देव-उपासना के परिणामों की कुछ चर्चा नीचे देखिये:— “एक बार कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा—मैंने सूर्य की उपासना की, इससे तू मेरा एक पुत्र हुआ । तू सूर्य की किरणों का सब ओर से आवर्तनकर, उन सबके रूप में ॐकार का चिन्तन कर, इससे निश्चय ही तेरे बहुत पुत्र होंगे ।” —छान्दोग्य, पंचम खंड “सूर्य नारायण का आष्टाक्षर मंत्र नित्य जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi