१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६३ ) “जो ब्रह्मा है वही हरि हैं, जो हरि हैं वे ही महेश्वर हैं। जो काली है वही कृष्ण है, जो कृष्ण हैं वही काली है। देव और देवी को लक्ष्य करके कभी मन में भेद भाव उत्पन्न होने देना उचित नहीं है। देवता के चाहे जितने नाम और रूप हों, सभी एक हैं। यह जगत् शिव शक्तिमय है।” विभिन्न देवताओं की अलग-अलग उपासना का तात्पर्य परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करना है जो साधक के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों के लिये अलग-अलग विभागों के दफ्तरी एवं कर्मचारियों के पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकांक्षा के अनुरूप उनमें से समय समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है। किस देवता की आराधना किस प्रयोजन के लिये किस प्रकार करनी चाहिये इसका वर्णन और साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक मिलता है। श्रीमद्भागवत में भी इस प्रकार का प्रसंग आता है:– ब्रह्मवर्चसमामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । इन्द्रमिन्द्रिय कामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ॥ देवीं यायाँ तु श्रीकामस्तेजत्कामो विभावसुम् । वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्य कामोऽथ वीर्यवान् ॥ अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्ग कामोऽदितेः सुतान् । विश्वान् देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम् ॥ आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टि काम इलां यजेत् । प्रतिष्ठा कामः पुरुषो रोदसी लोक मातरो ॥ रूपाभिकामो गन्धर्वान्स्त्रीकामोऽप्सर उर्वसीम् ।