भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७३ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥३३॥ अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते । अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जयः ॥३४ अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति । कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी ॥ प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेदवित् ॥३५ यह जीव ( प्राणवायु ) 'ह'कार ध्वनि से बाहर आता है और 'स'कार ध्वनि से भीतर जाता है और इस प्रकार वह सदैव 'हंस-हंस' मन्त्र का जप करता रहता है ॥ ३१ ॥ इस तरह एक दिन रात्रि में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र सदैव जपता है ॥ ३२ ॥ इसका नाम 'अजपा गायत्री' है, जो योगियों के लिए मोक्ष- प्रदायक है, इसके संकल्पमात्र से सब पापों से छुटकारा मिल जाता है ॥ ३३ ॥ न इसके समान कोई विद्या है, न इसके समान कोई जप है और न इसके समान कोई ज्ञान भूत या भविष्यत काल में हो सकता है ॥ ३४ ॥ कुण्डलिनी में उत्पन्न हुई यह गायत्री प्राण- धारिणी प्राणविद्या और महाविद्या है, जो इसको जानता है वही वेदज्ञ है ॥३५॥ कन्दोर्ध्वे कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः ॥३६ ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति । येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारमनामयम् ॥३७ मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी । प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥३८ सूचीवद्गात्रमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया । उद्घाटयेत्कवाटं तु यथा कुञ्चिकया गृहम् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् ॥३९