१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयोगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ७६ वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीड्य सुचिरं योनिं च वामाङ्घ्रिणा हस्ताभ्यामनुधारयन्प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् । आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बद्ध्वा शनै रेचये— देतद्व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥६६ चन्द्रांशेन समभ्यस्य सूर्यांशेनाभ्यसेत्पुनः । या तुल्या तु भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६७ नहि पथ्यमपथ्यं वा रसा सर्वेऽपि नीरसाः । अतिभुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥३८ क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः । तस्य रोगाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ॥६९ कथितयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् । गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥७० ठोड़ी को छाती पर रखकर, बाँये पैर से योनि स्थान को देर तक दबाकर, दांये पैर को सीधा फैला दोनों हाथों से भली प्रकार पकड़े । तब दोनों कुक्षियों ( बगलों ) में श्वास भरे और फिर धीरे- धीरे उसका रेचन करे, यह सब प्रकार की व्याधियों को नष्ट करने वाली महामुद्रा कही जाती है ॥ ६६ ॥ पहले चन्द्र अंश ( बांयी नासिका ) से अभ्यास करे फिर सूर्य अंश ( दांयी नासिका ) से अभ्यास करे । जब दोनों की संख्या समान हो जाय तब अभ्यास का बन्द करदे ॥ ६७ ॥ इस मुद्रा के प्रभाव से पथ्य-अपथ्य ही नहीं, सब प्रकार का नीरस भोजन भी रसवान बन जाता है, अधिक खाया हुआ और तीव्र विष भी अमृत के समान पच जाता है ॥ ६८ ॥ क्षय, कोढ़, गुदावर्त ( भगन्दर ) गुल्म, अजीर्ण और आगे होने वाले समस्त रोग महामुद्रा के अभ्यास से शमन हो जाते हैं ॥ ६९ ॥ मनुष्यों को महासिद्धि देने वाली जो यह महामुद्रा यहाँ बताई गई है,