भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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लोकास्त्रयो गुणास्त्रयोऽक्षराणि एवं प्रणवः प्रकाशते । अकारो जाग्रति नेत्रे वर्तते सर्वजन्तुषु । उकारः कण्ठतः स्वप्ने मकारो हृदि सुप्तितः ॥७४ विराड्विश्वः स्थूलश्चाकार. । हिरण्यगर्भस्तैजसः सूक्ष्मश्च उकारः । कारणाव्याकृतप्राज्ञश्च मकारः । अकारो राजसो रक्तो ब्रह्मा चेतन उच्यते । उकारः सात्त्विकः शुक्लो विष्णुरित्यभिधीयते ॥७५ मकारस्तामसः कृष्णो रुद्रश्चेति तथोच्यते । प्रणवात्प्रभवो ब्रह्मा प्रणवात्प्रभवो हरिः ॥७६ प्रणवात्प्रभवो रुद्रः प्रणवो हि परो भवेत् । अकारे लीयते ब्रह्मा उकारे लीयते हरिः ॥७७ मकारे लीयते रुद्रः प्रणवो हि प्रकाशते । ज्ञानिनामूर्ध्वंगो भूयादज्ञानीनामधोमुखः ॥७८ एवं वै प्रणवस्तिष्ठेद्यस्तं वेद स वेदवित् । अनाहतस्वरूपेण ज्ञानिनामूर्ध्वगो भवेत् ॥७६ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । प्रणवस्य ध्वनिस्तद्वत्तदग्रं ब्रह्म चोच्यते ।.८० वह ( पर-तत्व ) सब जीवों के भोग काल में पृथक रूप से रहता है और सब अवस्थाओं में अधोमुख रहकर आनन्द रूप है ॥ ७३ ॥ 'अ'कार 'उ'कार और 'म'कार ये तीन, तीन वर्ण, तीन वेद, तीन लोक, तीन गुण, तीन अक्षर, तीन स्वर—ये सब प्रणव द्वारा प्रकाशित होते हैं। सर्व जीवों में जाग्रत अवस्था में 'अ'कार नेत्रों में रहता है, स्वप्नावस्था में 'उ'कार कण्ठ में रहता है और सुषुप्ति अवस्था में म'कार हृदय में रहता है ॥ ७४ ॥ 'अ'कार स्थूल, विराट और विश्व है, 'उ'कार हिरण्यगर्भ, तैजस और सूक्ष्म है और 'म'कार कारण, अव्याकृत और