भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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में होंगी। अतः आदेश को तार द्वारा इंग्लैंड भेजने से भी पुस्तकों का जहाज पर लदान रोका नहीं जा सकेगा। 22 जुलाई को भारत सरकार के एक अधिकारी एम.एम.एस. गुब्बाय ने आपत्ति उठाई कि पुस्तक के विवरण की भाषा समुद्री कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के लिए पर्याप्त नहीं है। इस कानूनी आपत्ति ने भारत सरकार के सामने नया संकट खड़ा कर दिया। क्या वे कानूनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए पुस्तक को अपनी आंखों से देखने तक प्रतीक्षा करते रहें? इसका अर्थ होगा भारत में पुस्तक का प्रवेश, जिसे रोकने के लि वे छह महीने से यह व्यायाम कर रहे हैं। बंबई सरकार अगले ही क्षण आदेश जारी होने के लिए छटपटा रही थी। दिन भर की माथा-पच्ची के बाद सरकार ने 22 जुलाई, 1909 को थोड़े संशोधन के बाद पुस्तक का विवरण देने के लिए निम्नलिखित शब्दावली को अपनाया- “भारतीय विद्रोह के बारे में वी.डी. सावरकर द्वारा मराठी में लिखित पुस्तक या पैंफलेट, जिसके जर्मनी में छपने की रिपोर्ट मिली है और उसका अंग्रेजी अनुवाद।” 23 जुलाई, 1909 की इस शब्दावली के साथ समुद्री कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत पुस्तक पर प्रतिबंध का आदेश अंततः जारी कर दिया गया। राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित सरकारी फाइलों से उपलब्ध वायसराय स्तर तक की इन उच्च-स्तरीय टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि 6 नवंबर, 1908 से 23 जुलाई, 1909 तक पूरे नौ महीने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग एवं भारत सरकार जी-तोड़ कोशिश करके भी पुस्तक की भाषा, शीर्षक, मुद्रण स्थान एवं उस प्रकाशित लेखक के नाम के बारे में सही जानकारी नहीं पा सके और अंधेरे में ही तीर चलाते रहे। प्रकाशन के पूर्व ही किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की ब्रिटिश सरकार की इस हताश कार्यवाही ने उसे बहुत हास्यास्पद स्थिति में ला दिया। अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य की अलमबरदार होने का ढिंढोरा विश्व भर में पीटनेवाली अपनी सरकार की वकालत करने में ब्रिटिश समाचार-पत्र एवं बुद्धिजीवी स्वयं को असमर्थ पाने लगे। इस पर सावरकर ने सर्वाधिक प्रतिष्ठित दैनिक ‘द लंदन टाइम्स' में संपादक के नाम पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार पर तीखा व्यंग्य तीर चला दिया। सावरकर ने लिखा-‘'ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वीकार किया है किवे निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते कि वह पुस्तक अभी छपी है कि नहीं। यदि ऐसा है तो सरकार ने यह कैसे जान लिया किवह पुस्तक भयावह राजद्रोहात्मक है? क्यों वे उसके छपने या प्रकाशन के पूर्व ही उसे प्रतिबंधित करने के लिए दौड़ पड़े? या तो सरकार के पास पांडुलिपि के प्रति है या नहीं है। यदि उनके पास पांडुलिपि की प्रति है तो वे मुझ पर राजद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चलाते, क्योंकि उनके सामने यही एकमात्र वैधानिक रास्ता खुला रह जाता है। और यदि उनके पास पांडुलिपि की प्रति है ही नही तो वे जिस पुस्तक के बारे में अपुष्ट अफवाहों या उड़ती बातों के अलावा कुछ 13