भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशन-पूर्व प्रतिबंध की असामान्य घोषणा ने पुस्तक को एकदम लोकप्रिय बना दिया। प्रत्येक देशभक्त युवा अंतःकरण उसे पढ़ने के लिए छटपटाने लगा। उस दुर्लभ पुस्तक की एक-एक प्रति उस जमाने में 300 रूपए में गुप्त रूप से बिकने लगी। उसे पढ़ना और पढ़वाना क्रांति-धर्म बन गया। एक प्रति गुप्त रूप से अनेक हाथों में क्रम से घूमती रहती। आतुर युवक पूरी-पूरी रात लालटेन की रोशनी में बंद कमरे में छिपकर पुस्तक का पारायण करते और स्वयं को क्रांति-मंत्र में दीक्षित मानने लगते। स्वाभाविक ही इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जगह-जगह उसके अनधिकृत संस्करण गुप्त रूप से छपने लगे। एक हाथ से दूसरे हाथ तक पुस्तक का प्रसारण यदि जोखिम भरा था तो उसका गुप्त रूप से मुद्रण तो बहुत ही जोखिम भरा रहा होगा। ऐसे कितने संस्करण किस-किस भाषा में कहां-कहां छपे, इसकी पूरी जानकारी आना अभी शेष है। कुछ ही संस्करणों की जानकारी अभी तक उपलब्ध हो पाई है। पुस्तक के अध्ययन की भूख केवल भारत तक ही सीमित नहीं थी, यूरोप, जापान और अमेरिका में भी उसकी चाह पैदा हुई। उसका फ्रेंच अनुवाद सन् 1910 में ही प्रकाशित हो गया। एम.पी.टी. आचार्य और मैडम कामा ने वह फ्रेंच अनुवाद तैयार किया। एक फ्रांसिसि क्रांतिकारी व पत्रकार ई. पिरियोन ने उसका प्राक्कथन लिखा। उसकी भाषा व शैली से अभिभूत होकर उन्होंने लिखा कि यह एक महाकाव्य है, दैवी मंत्रोच्चार है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्तक हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्योंकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरुद्ध युद्ध लड़ा। यह सही अर्थों में राष्ट्रीय क्रांति थी। इसने सिद्ध कर दिया कि यूरोप के महान् राष्ट्रों के समान भारत भी राष्ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है। " यद्यपि पुस्तक पर लेखक का नाम 'एक भारतीय राष्ट्रभक्त' छपा था; किंतु श्री पिरियोन द्वारा लिखित इस प्राक्कथन को फ्रेंच पत्रिका 'ले कोरियर' ने अपने 25 जुलाई, 1910 के अंक में छाप दिया। ब्रिटिश कोप से घबराकर फ्रांस की सरकार ने पत्रिका के उस अंक को ही प्रतिबंधित कर दिया। 10 मई, 1910 को 1857 की वर्षगांठ के अवसर पर एक चित्रमय पोस्टकार्ड जारी किया गया, जिसमें 1857 के क्रांति संदेश के साथ रानी लक्ष्मीबाई का चित्र छापा गया। चित्र के नीचे सूचना छापी गई-'1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक को पाने के लिए मैडम बी.आर. कामा को पेरिस क`पते पर पत्र लिखें या न्यूयॉर्क की एफ.एच. पब्लिकेशन कमेटी का पत्र लिखें। अंग्रेज बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों में भी इस पुस्तक को पढ़ने की उत्कंठा जाग्रत 15