१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंजाब में जहां-जहां सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थी। इस कारण उन सबने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रूके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंत्र्य को ललचाए थे, ऐसा बिल्कुल नहीं था; लश्कर के बाहर हर तरह के व्यवसायी नागरिक भी राज्य क्रांति के ‘बीज’ यहां-वहां छितराए हुए थे। मियां मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किले यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी सुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किसी यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये, तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी असुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहां के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए 13 मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिंगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने का विचार त्यागकर तथा उनको केवल अलग-अलग रखने का निर्णय लेकर उनमें से एक पलटन को शहर के बाजार में से ले जाया गया। परंतु किस लेन-देन के लिए वह फिरोजपुर का बाजार से चले तो उन्हें दुकानदारों और दूसरे लोगों ने स्वराज्य की हवा बेचना प्रारंभ किया, जिससे बाजार से निकलते-निकलते सिपाहियों के मन की चंचलता नष्ट हो गई; दृढ़ निश्चय हो गया और 'हर-हर महादेव' की घोषणा हो गई। सिपाहियों के आक्रमण से गोला-बारूद का भंडार बचाना कठिन लगते ही उसे उड़ा देने के सिवाए अंग्रेजों का अन्य उपाय ही न रहा। बारूद का भंडार उड़ा देखकर स्वराज्य का निशान जिस दिल्ली की प्राचीर पर स्वदेश वीरों को बुला रहा था उस प्राचीर की ओर सिपाही दौड़ चले। इसी समय फिरोजपुर शहर भी विद्रोही हो गया और यूरोपियन लोगों के बंगले, तंबू, भोजनालय, प्रोस्टेंट चर्च कैथोलिक चर्च जलाते, गिराते, लूटते, नष्ट करते लोग यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन कहां हैं, इसकी पूछताछ करते यहां-वहां घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन पहले ही बैरकों के पीछे जाकर सुरक्षित बैठे थे। सिपाहियों का पीछा करने जो अंग्रेजी सेना भेजी गई थी वह, जो सामने आया उसे मारते और अपनी क्रूरता पर घमंड करते हुए लौट आई। पंजाब में अंग्रेजों की सत्ता को जैसे अंदरूनी असंतोष का डर था वैसे ही उसे सरहद पार के अफगानी डकैतों का भी डर था। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की गुप्त चर्चा के समय लखनऊ की गुप्त समिति ने काबुल के अमीर की सहायता मांगने का प्रयास किया था। क्योंकि सन् 1856 के अगस्त माह में मि. फारसिथ के हाथ एक पत्र पड़ा था जिसमें यह स्पष्ट लिखा था- “लखनऊ के मुसलमानों ने अमीर दोस्त मोहम्मद से संबंध जोड़े हैं। अवध का राज्य अधिगृहीत हो गया है और अब हैदराबाद पर एक 1857 का स्वातंत्र्य समर - 129