१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर तलवार चलाई। परंतु फिर भी अपने धर्म का त्राता कश्मीर में है, ऐसी उत्कट भावना से वे हजारों सिपाही कश्मीर की ओर बढ़ ही रहे थे। धर्म का त्राता! हाय!! यह ज्ञात होते ही ि कवे कश्मीर की ओर आ रहे हैं, वहां के राजा राजपूत कुलोत्पन्न गुलाब सिंह ने उन अनाथ हुए और धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी बच निकलनेवाले हिंदू लोगों को अपने राज्य में प्रवेश करने से मना किया। इतना ही नहीं अपितू इन हिंदुओं में से जो कोई जहां कहीं भी मिल जाए उसे वहीं काट डालने का कड़ा आदेश अपने लश्कर को देकर उसने अपना यह 'सुकृत्य' अंग्रेजों के दरबार में बड़े गर्व से सूचित किया। अब या तो धर्मांतरण करना या फिर गुलामी स्वीकार करना या मृत्यु का आलिंगन करना, यही कुछ करना था उन्हें। इन तीनों में से उन हिंदू शूरों ने तीसरा रास्ता अपनाया। अंग्रेजों ने कदम-कदम पर निष्ठुरता से इतने कत्ल किए कि मैदानों में स्थित वध-स्तंभ निरपराध हिंदू रक्त से भीगकर सड़ने लगे। फिर भी अंग्रेजों को उस रक्तपात से घृणा नहीं हुई। वध-स्तंभ-स्थायी वध-स्तंभ-जब रात-दिन काम करते वधिक थक गए तब तोपों के मुंह खोले गए। और जिस 55वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजों के रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई थी उसका हर सिपाही तोप से उड़ा दिया गया। एक हजार हिंदू चुटकी बजाते गारद कर दिए गए। परंतु उस अंतिम समय में भी उन हिंदू वीरों ने अपना वीरत्व नहीं त्यागा। क्योंकि फांसी या तोप के प्रश्न के उत्तर में वे अटल होकर उत्तर देते-“कुत्ते फांसी पर नहीं मरेंगे-हमें तो तोप से उड़ाया जाना ही इष्ट है।|”60 घोर जंगली आदमी से लज्जित हो जाए, ऐसी क्रूरता से उपर्युक्त शूरवीरों को काट डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकार कहते हैं-"यह दंड क्रूरतम था, इसमें कोई शंका नहीं; परंतु उस समय की क्रूरता ही सर्वकालीन भूतदया है। भूतदया के लिए ही वह क्रूरता करना इष्ट था।” अंग्रेजी इतिहासकारों, तुम अपने ये बोल ध्यान में रखना, अच्छा! “घड़ी भर की क्रूरता में सदैव के लिए मानवता का मंगल निहित था।” इस वाक्य का जो अर्थ तुम अभी कर रहे हो वैसा ही वह तुम्हें क्या और थोड़ी देर बाद भी स्मरण रहेगा? सार्वकालिक भूतदया के लिए यह तात्कालिक क्रूरता कर रहे हो वह तो ठीक है, पर उधर कानपुर में हिंदुओं का नाना साहब बैठा हुआ है, यह भी थोड़ा ध्यान में रखना। यहां एक बात और कहनी चाहिए कि क्रांतिकारियों द्वारा की गई मार-काट का वर्णन जो अंग्रेजी इतिहासकार कमाल की नाटकीयता से करते हैं वे ही (अंग्रेजी इतिहासकार) अंग्रेजों द्वारा किए गए अक्षम्य, अनन्वित एवं अमानुषिक अत्याचारों को जान-बूझकर छिपाने का प्रयास करने लगते हैं। उपर्युक्त दुर्दैवग्रस्त परंतु स्वाभिमानी रेजिमेंट का कत्लेआम जब चल रहा था तब उनके मृत्यु पूर्व तक अंग्रेजों के राक्षसी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 132 60 के द्वारा प्रस्तुत वृत्तांत।