भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 166, कुल 418 में से

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वैर एकाएक नामशेष करने के प्रयास में स्वाभाविक रूप से एकाएक उठी भ्रांतियों के कारण विद्रोह के पहले झटके में ही इधर-उधर अनियंत्रण आरंभ न होना बहुत कठिन था। सृष्टि के पहले प्रलय होना चाहिए। उसे रोक पाना ईश्वर के लिए भी असंभव था। जिन्हें राज्य क्रांतियां चाहिए उन्हें ऐसे संकट रास्ते में मिलेंगे ही। पर लूटपाट और आगजनी का पहला हफ्ता गुजर जाने के बाद अंधाधुंधी के सारे संकट दूर हो इलाहाबाद में क्रांति होती हैं वहां-वहां क्रांति क्षण के बाद पहली समस्या नेता की होती है। परंतु यह बाधा इलाहाबाद में जल्द ही टल गई; क्योंकि मौलवी लियाकत अली नामक एक कट्टर स्वतंत्रता-भक्त जल्दी ही उस क्रांति का नेता बन गया। इस पुरूष की जो संक्षिप्त जानकारी मिलती है वह यह कि यह जुलाहों का प्रमुख धर्मगुरू था। क्रांति के पहले उसने विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था। इसकी धर्मशील पवित्रता से इसपर लोगों की श्रद्धा हो गई थी। विद्रोह के बाद जनता द्वारा इलाहाबाद स्वतंत्र करते ही कुछ दिनों में चौबीस परगना के जमींदारों ने इस मौलवी को इलाहाबाद में लाकर प्रांत का मुख्य अधिकारी नियुक्त किया और बड़े समारोह के साथ दिल्ली के बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में उसे नाम की डाँड़ी पीट दी गई। इस मौलवी ने अपना मुख्यालय खुसरो बाग में बनाया। इस बाग के चारों ओर एक मजबूत दीवार थी। फिर उसने सारे प्रांत के विद्रोहियों को संगठित करना प्रारंभ किया। उसने जल्दी ही सारे सरकारी काम और षड्यंत्र व्यवस्था से प्रारंभ करवाएं। “मैं दिल्ली के बादशाह का सूबेदार हूं", केवल वह कहता ही नहीं रहा, ऐसा इलाहाबाद के सारे समाचार और घटनाओं की सरकारी रिपोर्ट अंत तक दिल्ली के बादशाह को भेजता भी रहा। मौलवी लियाकत अली को इलाहाबाद का किला अपने अधीन करने का काम सबसे पहले करना था। उसके अधीन जो सेना इकट्ठी हो गई थी उसे किले पर हमला करने के लिए सज्जित करने के प्रयास और प्रबंध उसने चालू किए थें उसी समय जनरल नील के बनारस से इलाहाबाद की ओर घूम जाने का सामचार आ पहुंचा। यदि उन चार सौ सिखों को सुबुद्धि आई होती तो तोपें, शस्त्र, गोला-बारूद सहित वह प्रचंड किला एक भी गोली चलाए बिना विद्रोहियों के हाथ पड़ जाता। जनरल नील के हृदय में वह बात लगातार चुभ रही थी, इसलिए उसने रात को दिन बनाते हुए सेना के साथ इलाहाबाद की ओर कूच किया। 11 जून को नील इलाहाबाद आया। उसके अपने तक किला और उसमें रह रहे अंग्रेजों का सिख लोग संरक्षण करेंगे, इसकी नील को बिल्कुल आशा न थी, अतः जब उसने किले पर अंग्रेजी झंडा फहराते देखा तो उसे बहुत प्रसन्नता हुई। उसने अपने साथ की यूरोपियन सेना को तत्काल किले की सुरक्षा के लिए लगाकर उन राजनिष्ठ सिखों को किले के बाहर निकाल लड़ाई के काम में लगा दिया। नील का 1857 का स्वातंत्र्य समर – 170

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