१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह हमेशा का निर्णय था, पर अब स्थिति हमेशा की नहीं थी। 86 यह अपमानजनक समाचार फैलते ही सारी सेना गुर्राने लगी-‘ठीक है! हमारी बंदूकें भी अब जल्दी ही गलती से`चल जाएंगी।´’ यह वाक्य सिपाहियों के बीच एक उत्क्षोभक नरसिंह मंत्र ही हो गया था। एक-दूसरे को मिलते ही 'अब बंदूक गलती से चलेगी ना!' ऐसी व्यंग्यात्मक सलामी सेना में दी जाने लगी। फिर भी मेरठ की तरह जल्दी न कर संकेत समय आने तक उन्होंने सारा गुस्सा मन-ही-मन पी जाने का निश्चय किया था। इस भयानकता को और भयानक करने के लिए ही शायद उसी समय एक अंग्रेज और उसकी पत्नी-दोनों के शव गंगा प्रवाह में बहते-बहते कानपुर आ गए। ऊपर किसी शहर के विद्रोहियों के लिए कृत्य का साक्ष्य कानपुर से क्या-क्या भयंकर संवाद करेगा? गंगा को अभी ऐसे कितने ही शव बहाने हैं। 'भेड़िया आया रे भेड़िया'-ऐसी अफवाह उड़ाकर अब तक अंग्रेजों का इतनी बार चकित किया गया था कि अब यदि भेड़िया आया तो भी वे सचमुच सोते रहनेवाले थे। जून क पहली तारीख को स्वयं सर हो व्हीलर लॉर्ड केनिंग को लिखता है-“क्षोभ और डर रहा नहीं। कानपुर सुरक्षित है। इतना ही नहीं, मैं लखनऊ को जल्दी ही सहायता भेजे देता हूं।´´ इलाहाबाद से आई हुई गोरी फौज वास्तव में लखनऊ की ओर जाने लगी और वह भी कब? 3 जून को। जिस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र का समाचार अंग्रेजों और उनकी सहायता करनेवाले नानकचंद जैसे कुल्हाड़ी के बेंटे से भी इतनी मुहरबंद रहे-यह कितना बड़ा आश्चर्य था! यह मुहर 4 जून की रात को टूटी। सार्वजनिक कार्यक्रम के अनुरूप रात के अंधेरे में कुछ बंदूकें चलीं और निश्चित भवनों को आग लगी। रक्तपात, नाश और मृत्यु की दौड़ शुरू हो जाने की वह करतल ध्वनि थी। सबसे पहले टीका सिंह का घोड़ा कर्कश रीति से हिनहिनाया और उसी के साथ हजारों घोड़ें एक क्षण में टापों की आवाज करते सरपट दौड़ते निकले। कुछ अंग्रेजी पगड़ियों और घरों को आग लगाने निकले, कुछ अन्य रेजिमेंटों को बुलाने गए और कुछ लश्करी निशानों और झंडों को कब्जें में लेने निकले। ये झंडे जिसके कब्जे में थे, वह वृद्ध सूबेदार मेजर नेटिव होते हुए भी विद्रोहियों के विरूद्ध जाता-सा दिखाई दिया, अतः एक तलवार का वार उसके सिर पर पड़ा और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 184 86 ट्रेवेलियन ने लिखा है-“निम्न स्तर के यूरोपियनों की क्रूरता तथा सैनिक अधिकारियों द्वारा न्याय के नाम पर की जानेवाली धींगामस्ती से सिपाही भलीभांति परिचित थे। किसी अन्य अवसर पर तो संभवतः उन्हें इस प्रकार के न्याय पर किसी प्रकार का आश्चर्य न होता; किंतु अब तो उनका रक्त खौल उठा था, उनका आत्माभिमान जाग्रत् हो चुका था, जिससे किसी एंग्लो-सेक्सन वंशज को ऐसा अधिकार एवं सैनिक न्यायलय की विवेचना शक्ति की प्रखरता को मान्यता देने के लिए वे तत्पर नहीं थे।” -'कानपुर', पृष्ठ 93