भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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विद्रोह की शुरूआत में ही सारी सेना दिल्ली में ही जमा हो जाए तो वास्तविक कार्यक्रम सिद्ध नहीं होना था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजी की खिंचाई करने में ही भला था। उसमें भी कानपुर, पंजाब, कलकत्ता और दिल्ली प्रांत के बीच की कड़ी होने से उसपर आघात कर अंग्रेजी यातायात को तोड़ना अति आवश्यक था। ये सारी बातें सिपाहियों को उनके सूबेदारों एवं नाना के मंत्रियों के समझाने पर कानपुर की ओर ही वापस लौटने की योजना सर्वसम्मति से बनी। उन तीन हजार सिपाहियों ने श्रीमंत नाना साहब को अपना राजा चुना और उनके प्रत्यक्ष दर्शन की तीव्र इच्छा प्रदर्शित की। श्रीमंत नाना साहब को देखते ही उनके नाम से सब ओर जयघोष होने लगा और उन सभी ने उस स्वयं वृणीत महाराजा के भक्तिभाव से मुजरे किए। श्रेष्ठ का चयन होते ही नाना की सहमति से अपने लश्करी अधिकारी चुनने का काम शुरू हुआ। लश्कर के सारे नए नियम प्रचारित किए गए। कानपुर के क्रांति केंद्र के प्राण सूबेदार टीका सिंह को उसके जनरल का पद दिया गया। वैसे ही जमादार दलगंजन सिंह को 53वीं रेजिमेंट का कर्नल और सूबेदार गंगादीन को 56वीं रेजिमेंट का कर्नल नियुक्त किया गया। फिर हाथी की पीठ पर एक बड़ा भारी स्वातंत्र्य ध्वज खड़ा कर उसका जंगी जुलूस निकाला गया और उस दिन से श्रीमंत नाना साहब पेशवा का शासन आरंभ हो जाने की घोषणा कर दी गई। परंतु यह चुनाव होते ही श्रीमंत नाना ने एक क्षण भी गंवाया नहीं और विप्लवी सिपाही दिल्ली की ओर न जाकर बीच में ही रूक गए हैं, यह समाचार सुनते ही जनरल व्हीलर सहित सारे अंग्रेज लोग अपनी उस चारदीवारी के किले में जाकर और तोपें तानकार बैठ गए। उनके पुरूष, महिला, बच्चे मिलकर संख्या कोई 1,000 थी। वह किला जीतना सबसे पहला कर्तव्य था, अतः श्रीमंत नाना ने सारी सेना को उधर चलने का आदेश दिया। विप्लवी उनपर हमला करेंगे, यह विश्वास अंग्रेजों को न था। परंतु 6 जून की भोर में एक चिट्ठी सर व्हीलर को मिली। वह चिट्ठी श्रीमंत नाना ने ही भेजी थी और वह ऐसी थी- "हम जल्दी ही आक्रमण करने वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" हम जल्दी ही आक्रमण करने वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" यह लड़ाई का आह्वान पाते ही सर व्हीलर ने सारे अधिकारियों और सोल्जरों को सज्जित कर स्थान-स्थान पर नियुक्त किया। तोपों पर गोलंदाज बत्ती के साथ बैठ गए और लड़ाई की यथासंभव तैयारी कर ली गई। लड़ाई प्रारंभ करने से पहले श्रीमंत नाना ने अंग्रेजों को, किसी भी प्रकार की विशेष आवश्यकता न होते हुए भी, अग्रिम लिखित सूचना दी थी। यह बात अति महत्त्व की है। अंग्रेज यदि नाना के स्थान पर होते तो इतनी उदारता उन्होंने निश्चित ही न दिखाई होती। श्रीमंत नाना के नाम पर अमानुषता का दाग लगाना चाहनेवाले लोगों को उनके हृदय की यह सहज वीरता देख लज्जा से सिर झुका लेना चाहिए। कानपुर विद्रोह के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 186