भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

उसको मिलेगा। इसलिए इसके बाद सारे हिंदू और मुसलमान-अंग्रेजों से चल रहे इस झगड़े में इकट्ठे आकर अपने किसी भी आदरणीय नेता की नीति पर चलने को तैयार हो जाएं। इस तरह देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने में हमारी सहायता करें। गरीब लोगों को संतुष्ट रखने के लिए प्रयास करें और उनको अधिक अधिकार व प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराएं। जिस-जिसको संभव हो, वह इस घोषणापत्र की प्रतियां बनाकर गांव के मुख्य स्थानों पर चिपकाएं। ऐसा करते समय उचित युक्ति का उपयोग करें और पकड़े न जाने की दक्षता रखें और उसका प्रचार होते-न-होते अपनी तलवारें निकाल फिरंगियों पर प्रहार करें।" अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध स्वतंत्रता युद्ध घोषित करने के कुछ ही समय बाद वह युद्ध चालू रखने के लिए दिल्ली के क्रांतिकारियों ने शस्त्र और गोला-बारूद का उत्पादन करना आरंभ कर दिया, तोपें, बंदूकें और छोटे हथियार बनाने के लिए एक बड़ा कारखाना चालू किया गया और इस शस्त्र उत्पादन पर देखरेख के लिए कुछ फ्रेंच लोगों को नौकरी पर रखा। गोला-बारूद रखने के लिए दो-तीन गोदाम बनाए गए और रात-दिन काम चालू रखकर कामगारों से भरपूर गोला-बारूद्ध निर्माण करने की व्यवस्था की गई। सारे देश में कानून से गो वध बंदी लागू की गई और एक बार जब कुछ सिरफिरे मुसलमानों ने हिंदुओं का अपमान करने के लिए उनके विरूद्ध जेहाद की घोषणा की तब उस बूढ़े बादशाह ने अपने लवाजमे के साथ हाथी पर बैठकर सारे शहर से एक विशाल जुलूस निकालकर यह घोषित कर प्रकट किया कि अपना यह जेहाद केवल विदेशी फिरंगियों के लिए है, हिंदुओं के विरूद्ध नहीं है। जो कोई भी गाय की हत्या करता पाया जाएगा उसे तोप से उड़ा दिया जाएगा या उसके हाथ काट दिए जाएंगे। अलग-अलग रेजिमेंटों व टोलियों को भिन्न-भिन्न राजपुत्रों के नाम दिए गए। अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांतिकारियों की इस लड़ाई में कुछ यूरोपियनों ने भी सहयोग दिया। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना को आगे की सैनिक कार्यवाही करने के लिए बहुत उचित स्थान मिल गए थे। दिल्ली की चारदीवारी के एक छोर तक आकर भिड़ी और यमुना नदी के आगे चार मील तक दूर फैली हुई टेकरियों की एक श्रृंखला थी-अंग्रेज जिसे Ridge कहते हैं-उन टेकरियों की प्राकृतिक ऊंचाई युद्ध की दृष्टि से बहुत लाभदायक थी। पासस-पड़ोस के समतल प्रदेश की अपेक्षा टेकरियों की ऊंचाई पचास-साठ फीट होने से वहां से तोपों की निरंतर और प्रभावी मार करने के लिए उस स्थान का अच्छा उपयोग हो सकता था। इन टेकरियों के प्रदेश से लगी हुई यमुना की चौड़ी नहर थी, जिसमें इस वर्ष जोरदार वर्षा होने से जून माह में भी अच्छा पानी था। वह नहर पीछे की ओर होने से अंग्रेजों के शत्रुओं की ओर से भी उस नहर को कोई धोखा नहीं होना था, केवल सामने से, दिल्ली की ओर से क्रांतिकारियों के जैसे हमले होते थे वैसे ही पीछे की ओर से, पंजाब की ओर से, यदि हमले हुए होते तो अंग्रेजों की शामत आ जाती। अंग्रेजों के सौभाग्य से पंजाब ने उनकी ओर से ही लड़ने की ठानी। नाभा, जींद और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 238