१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसी परिस्थिति में इन असंख्य और भिन्न-भिन्न सैनिकों पथकों को संगठित कर एकरूपता निर्माण कर सके, ऐसे किसी नेता की आवश्यकता होती है। इस समय क्रांति काल में सहजता से प्रकट होनेवाली लोगों की दुष्ट प्रवृत्तियों और वाममार्गी मनोवृत्तियों में यद्यपि भयानक उफान कर उनमें अपने लिए भय का निर्माण कर उन्हें अपने काबू में रखा था। परकीय शत्रु को देश के बाहर भगा देने की जो अति उत्कट इच्छा सैनिकों और समान्य नागरिकों में निर्मित हुई थी उसके बल पर ये हमले हो रहे थे। परंतु अंतिम विजय प्राप्त करना हो तो केवल प्रबल इच्छाशक्ति से काम नहीं होता, उसके लिए संगठित और विधिवत् प्रयास और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए अपनी सेना सहित और अपार संपति सहित रुहेलखंड का शूर बख्त खान दिल्ली पहुंचा-अर्थात् उसे ईश्वर ने भेजा, ऐसा लगने लगा। इसका वर्णन उसी समय दिल्ली में ही रहते एक सज्जन ने अपनी दैनंदिनी (डायरी) में लिखा है। उस दैनंदिनी का एक उद्धरण उस काल की दिल्ली का केवल दर्शन ही नहीं कराता बल्कि वह लोगों की कुल विचारधारा और घटनाओं पर भी प्रकाश डालता है- "रुहेलखंड की विद्रोही सिपाही टुकड़ियां जल्दी ही आने वाली हैं, इस अपेक्षा में यमुना का पुल ठीक कर लिया गया। तारीख 2 जुलाई को प्रातः नवाब अहमद कुली खान अपने सरदारों और नागरिकों के साथ रुहेलखंड की सेना का स्वागत करने सामने गया। उस समय हकीम अहसनुल्ला खान, सेनापति सनद खान, इब्राहिम अली खान, गुलाम कुली खान और अन्य नामवर नेता भी उपस्थित थे। रुहेलखंड की सेना के सेनापति मोहम्मद बख्त खान ने बादशाह को अपनी सेवाएं स्वीकार कर लेने का निवेदन किया। बादशाह को उसकी क्या इच्छा है, यह कहन का बख्त खान ने जब आग्रह किया तब बादशाह ने कहा, 'लोगों को पूरी सुरक्षा मिले, उनकी जान और माल की हिफाजत हो और अंग्रेज शत्रु को नष्ट करने का कार्य सफलता से पार पड़े, यह मेरी तीव्र इच्छा है।' उसपर सेनापति ने कहा कि आपकी इच्छा हो तो क्रांतिकारी सेना के सरसेनापति के पद पर मैं काम करने को तैयार हूं। उस समय बादशाह ने बड़े प्यार से सेनापति का हाथ दबाया। वैसे ही भिन्न-भिन्न पलटनों के प्रमुखों को इकट्ठा बुलाकर पूछा गया कि-सारी सेना के सेनापति पद पर बख्त खन का चयन करने को वे तैयार हैं क्या? सब लोगों ने 'हां, हां, कहा। और सरसेनापति के आदेशों का पालन करने की लश्करी और सैनिकी शपथ भी सबने ली। "यह शपथ विधि पूरी हो जाने पर बादशाह ने फिर से बख्त खान से निजी भेंट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 244