भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

नाम कमाया था ऐसे सारे जॉन लॉरेंस ने दिल्ली में अंग्रेजों की सहायता के लिए भेज दिए थे। सेनापति बर्नार्ड ने पहले कई बार दिल्ली पर हमला करने की बात सोची थी, पर उसे पूरा नहीं किया गया था। अब नई कुमुक मिल जाने से उसने दिल्ली पर सीधे और साहसी आक्रमण करने का निश्चय किया। पहले जैसी ही इस हमले की सारी योजना बनाई गई और 3 जुलाई को हमले की तैयारी के साथ अंग्रेजी सेना कूच कर गई। पर यह क्या? किसी ने यह समाचार दिया कि सरसेनापति बख्त खान ने अंग्रेजों के दिल्ली पर चढ़ाई करने का श्रम बचा दिया! क्योंकि वह स्वयं ही उनपर हमला करने आ रहा है। तारीख 4 जुलाई को बख्त खान फिर चढ़ आया और उसने अंग्रेजों को अलीपुर तक पीछे ढकेला। दिल्ली गए, दिल्ली शहर पर केवल नजर फेंकी, दृष्टि पड़ी कि उसे सहज ही हमने जीता, ऐसी गर्वोक्तियां दिल्ली को घेरने के पहले जो अंग्रेज करते थे वे पंजाब से नई प्रबल पलटनें आने के बाद भी-पूरे एक माह में एक कदम भी-आगे नहीं बढ़ा पाए। यह देखकर भावना प्रधान सेनापति बर्नार्ड को अति दुःख और शर्म लगती। अंग्रेज दिल्ली जीतने को जितने आतुर थे उससे भी अधिक उनका आत्मविश्वास उसे सहज ही जीतने का था। वह ऐसा आत्मविश्वास था कि मुंबई, कलकत्ता और मद्रास तक दिल्ली जीत लेने का समाचार फैल गयां और जब अंग्रेजों को बार-बार यह दिखाई दिया कि ये समाचार निराधार हैं तब सारे हिंदुस्थान के लोग एक-दूसरे से पूछने लगे- "दिल्ली में अंग्रेजी सेना कर क्या रही है?" यही चिंता और शर्म बर्नार्ड के मन में बस गई थी और पहले की इस अंधकारमय परिस्थिति से कुछ भिन्ना हो सकेगा, उस समय ऐसा उसे नहीं लगता था। उलटे भावी समय का विचार करते हुए उसे वह अधिक अंधियारा ही लगता। सिपाहियों के लगातार होनेवाले हमलों के कारण उसे रत्ती भर विश्राम नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की उस राजधानी पर सीधा और साहसी हमला करने की उसकी महत्त्वाकांक्षा उगते हर नए दिन धुलती जा रही है, उसे ऐसा दिखता था। अंत में शरीर से थका, मानसिक चिंता से ग्रस्त और निराशा में डूबा हुआ अंग्रेज सेनापति बर्नार्ड 5 जुलाई को हैजे की महामारी की बलि चढ़ गया। इस समाचार से अंग्रेजी छावनी की सेना पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा। दिल्ली में प्रवेश करने का प्रयास करनेवाला यह दूसरा अंग्रेज सेनापति दिल्ली में तो नहीं, कब्र में प्रवेश करने में सफल हुआ। उसके बाद सेनापति रीड ने सेना के अधिकार सूत्र अपने हाथ लिये और वह अंग्रेजी सेना का तीसरा सेनापति हो गया। अंग्रेजी छावनी में हमला करने की जब योजनाएं बन रही थीं, दिल्ली के नागरिकों तब प्रत्यक्ष कृति कर रहे थे। स्थानाभाव के कारण उन सबका वर्णन यहां नहीं कर सकते। ऐसा होते हुए भी 9 जुलाई और फिर से 14 जुलाई के दिन जिस दृढ़ता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 247