भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-2 हैवलॉक जब सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद का किला क्रांतिकारियों को न सौंपकर अंग्रेजों को दे दिया, तभी से अंग्रेजों ने उसे अपनी कार्यवाही का मुख्य शिविर बनाया। उत्तर हिंदुस्थान की मुलुकी और लश्करी कार्यवाहियां कलकत्ता जैसे दूरस्थ केंद्र से करनी पड़ती थीं और उसमें धोखा था, जो इस नए केंद्र के कारण नहीं रहा। विद्रोह का शमन होने तक राजधानी इलाहाबाद में ही रखने का निर्णय लॉर्ड केनिंग ने किया और कुछ ही दिनों में वह स्वयं इलाहाबाद रहने के लिए चला आया। परंतु तभी कानपुर के अंग्रेजों की भागम-भाग के समाचार और उनके द्वारा सहायता के लिए मचाई गई चिल्लपों सुनाई देने लगी, इसलिए जनरल नील ने इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए थोड़ी सी सेना रखकर शेष सारी सेना को मेजर रेनॉल्ड के नेतृत्व में कानपुर का घेरा तोड़ने के लिए भेज दिया। यह सेना रास्ते के गांवों में मन मरजी आग लगाते बढ़ी। उस समय कानपुर की अंग्रेजी सेना के सेनापति पद पर नील के स्थान पर हैवलॉक की नियुक्ति हुई। वह जून के अंत में इलाहाबाद आया। वह सैनिक कार्यवाहियों में पारंगत और अनुभवी अधिकारी था। अंग्रेजों के सौभाग्य से इधर विद्रोह के प्रत्यक्ष फूट पडत्रने के समय अंग्रेजों का ईरान से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया और उस अभियान में लगी सारी यूरोपियन सेना हैवलॉक जैसे सेनानी सहित हिंदुस्थान में ऐन आपात स्थिति में आ पहुंची। हैवलॉक के इलाहाबाद में मुख्य अधिकारी होकर आ जाने से उसके अधीन काम करना पड़ेगा, यह देखकर नील के मन में यद्यपि बड़ा मत्सर जागा, फिर भी उसने सार्वजनिक कर्तव्य में 1857 का स्वातंत्र्य समर — 250