१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीन' की भयानक चिंघाड़ सुनाई दी और विद्रोहियों के गोलों का हमला हुआ। भयंकर रक्तपात होने लगा, मृत्यु का नाच शुरू हो गया, विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सेना हतोत्साहित होकर पीछे हटी। सामने से यह पीछे हटना देखकर वह हठी वीर निकल्सन बाघ-सा-झपटा। शूरवीरों को जग में कुछ भी असाध्य नहीं, यह जिसका संकल्प था, वह निल्सन बर्नबेस्टन पर हुए अपमान से चिढ़कर फिर उस गली में घुसने लगा तो वहां फिर घमासान मच गया। इस दौ सौ गज लंबी गली में उस दिन जो मारकाट हुई वह पानीपत जैसे रण का एक संक्षिप्त संस्करण ही थी। जों अंग्रेज आगे पैर बढ़ाता उसे स्वतंत्रतार्थी जेहादी समर में गिरा ही देंगे, यह बात पक्की धकेलने लगी। शूर मेजर जैकब को भी उसने दांतों के नीचे रख चबा डाला। वीर निकल्सन, अब तुम ही आगे बढ़ो। तुझे छोड़कर अंग्रेजी सेना के सारे सेनापति इस गली ने नष्ट किए हैं। आया, हे स्वातंत्र्याभिमानी गली, वीरता की गुफा, आ गया स्वयं निकल्सन तुझपर दौड़ा। अब वास्तविक परीक्षा है। निकल्सन उस गली पर और गली निकल्सन पर। भयंकर युद्ध हुआ। तभी अंग्रेजी सेना में बिजली गिरने जैसा हाहाकार मच उठा। हटो, हटो! अंग्रेज सेना कहने लगी और छांटो-काटो-यह यह कोलाहल उस गली में उठा। जिसके नख निकल्सन के रक्त से भर गए थे वह भयंकर गली। जिसकी लंबाई के हर इंच पर किसी-न-किसी अंग्रेज की कब्र होगी। उस वीर्यवान गली से दूसरी बार भाग चली उस अंग्रेजी सेना का भाग किसी अंग्रेजी शासन में कभी उदय नहीं हुआ था। उनके चार भागों में से तीन भागों के प्रमुख कमांडर घायल हुए। छियासठ मृत्यु संख्या से क्या प्राप्त किया, यह देखने पर जनरल विल्सन को ज्ञात हुआ-दिल्ली के परकोटे का एक-चौथाई भाग हाथ में है। भय, चिंता और निराशा से पागल हुआ वह अंग्रेज कमांडर बोला, "दिल्ली छोड़कर तत्काल पीछे हट जाना चाहिए। सारा शहर अभी अविवाहित ही बना हुआ है। मेरे अधीनस्थ शूर लोगों की एक गली ने रक्षा की और जो मुट्ठी भर लोग अभी भी जीवित हैं उन्हें हजारों विद्रोही हर घर से आगे आने को बड़ी शान से बुला रहे हैं। ऐसी स्थिति में सारे-के-सारे लोग मर जाएं या पीछे लौटने का अपयश स्वीकार करें। " अंग्रेजों का मुख्य कमांडर 1857 का स्वातंत्र्य समर -280