भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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दिल्ली में लड़ाई करता हुआ दूसरी जगह निकल जा रहा हूं। शत्रु की शरण जाने की अपेक्षा लड़ाई करते हुए बाहर निकल जाना ही हमें इष्ट लगता है। ऐसे समय आप भी हमारे साथ चलें और अपने झंडे के नीचे हम स्वराज्य के लिए ऐसे ही लड़ते रहें।'8 बाबर, हुमायू या अकबर के तेज का शतांश भी यदि इस वृद्ध मुगल में होता तो उसने यह वीरतापूर्ण निमंत्रण मानकर उस साहसी बख्तर खान के साथ दिल्ली से कूच किया होता। पर बुढ़ापे से बलहीन, राजविलास से मतिमंद और पराजय से भयभीत हुए उस बादशाह ने अंतिम समय तक अपनी अनिश्चितता और चंचलता बनाए रखी। अंतिम दिन वह हुमायूं की कब्र में छिपकर बैठा और बख्तर खान का निमंत्रण अस्वीकार कर इलाही बख्श मिर्जा के उपदेश के अनुसार अंग्रेजों की शरण जाने लगा। इलाही बख्श असल दगाबाज था। उसने यह समाचार अंग्रेजों को दिया अंग्रेजों ने तत्काल कैप्टन हडसन को उधर भेजा। जीवनदान का वचन लेकर बादशाह ने समर्पण किया। उसे महल तक लाकर कैद में डाल दिया गया। फिर दगाबाज कुत्ते इलाही बख्श और मुंशी रजब अली दौड़े आए और बोले, "अभी शहजादे हुमायूं के मकबरे में ही छिपे बैठे हैं।“ फिर हडसन दौड़ा गया। शहजादों ने समर्पण किया और उन्हें वह गाड़ी में बैठाकर दिल्ली की ओर ले चला। शहर में पैर रखते ही हडसन शहजादों की गाड़ी के पास दौड़कर पहुंचा और चिल्लाकर बोला, "अंग्रेजों की महिलाओं, बच्चों का वध करनेवालों को मृत्युदंड ही दिया जाना चाहिए।" कांपते हुए वे गाड़ी से नीचे खींचे गए, उनके शरीर के सारे वस्त्र उतार लिये गए और हडसन ने उन शरणागत शहजादों की ओर से अपना मुंह फेरा और तीन गोलियों से उसने उन तीनों शहजादों का मार डाला। तैमूर के वंशवृक्ष की वे अंतिम पत्तियां हडसन ने तोड़ डाली। परंतु उसकी क्रूरता का समाधान इन शरणागत शहजादों को केवल गोलियों से भूनकर नहीं हुआ। मृत्यु तक तो जंगली आदमी भी बदला लेते है। फिर सभ्य आदमी में और उनमें अंतर ही क्या रहा! इसलिए उन शहजादों के शवों को उठाकर दिल्ली की कोतवाली की ओर फेंका गया। गिद्धों को तैमूर के वंशजों की बढ़िया दावत देने के बाद उन सड़े शवों को खींचकर नदी में फेंक दिया गया। अकबर के वंशजों को दफनाने के लिए कोई भी न रहा! हे कालचक्र! तेरे कैसे-कैसे खेल हैं? अब सिखों को सचमुच लगने लगा कि उनके ग्रंथ में लिखा भविष्य सच हुआ। पर वह किस अर्थ में? किस तरह क्या फलित देकर? फिर दिल्ली में भयानक कत्ल और लूट चालू हुई। उसका वर्णन सुनकर लॉर्ड एलफिंस्टन जॉन लॉरेंस को लिखता है-"दिल्ली का घेरा समाप्त हो जाने पर अपनी सेना ने दिल्ली का जो हाल किया वह हृदयद्रावक है। शत्रु और मित्र का भेद न करते हुए सरेआम बदला लिया जा रहा है। लूट में तो हमने नादिरशाह को भी मात दे दी।"126 यूरोपियन और नेटिव सिपाहियों सहित दिल्ली के घेरे में लगी अंग्रेजों की सेना

1857 का स्वातंत्र्य समर - 282

126 'लाइफ ऑफ लॉरेंस', खंड 2, पृष्ठ 262 ।