१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वधर्म और स्वराज्य धर्मासाठी मरावे, मरोनि अवघ्यांसी मारावें। मारिता मारित घ्यावें, राज्य आपुलें।। —स्वामी रामदास अर्थात्– धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते–मारते जीतें, राज्य अपना। कोई छोटा सा घर बनाना तो भी इतनी मजबूत नींव तो बनाई ही जाती है कि वह उसका भार सह सके। नींव मजबूत और घर का भार संभालने योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित–गंवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहारज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था–तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास–लेखन के पवित्र कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य है। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 33