भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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और उसकी सेना यमुना के तट पर कालपी में भी तैयार है। इस तरह कालपी में दबाव, ब्रह्मवर्त से दबाव, अवध से दबाव, गंगा के इस तीर पर दबाव, उस तीर पर दबाव, ऐसा चारों ओर से दबा हुआ वह ‘विजयी’ हैवलॉक कलकत्ता को लिखता है—“भयानक पेच पड़ा हुआ है। नई कुमुक नहीं आई तो कानपुर छोड़कर इलाहाबाद तक पीछे लौटने की बारी अंग्रेजी सेना को जल्द ही आए बिना नहीं रहेगी।” इस पत्र के उत्तर में नई कुमुक भेजी जाएगी और फिर आज तक सही हुई जय-पराजय की भरपाई लखनऊ का रक्त पीकर कर डालेंगे, ऐसी भावी आशा से हैवलॉक कलकत्ता के पत्र क प्रतीक्षा कर रहा था तो उसे आदेश आया कि-लखनऊ जानेवाली अंग्रेजी सेना का अधिकार तुमसे कठोर होता है! विजय हुई, परंतु कानपुर विजय में किंचित् देर हुई, इसलिए नील जैसे योद्धा को हटाकर हैवलॉक नियुक्त किया गया। विजय प्राप्त हो जाने पर भी लखनऊ की ओर जाने में उसे अनिवार्य देरी हुई, इसलिए हैवलॉक जैसे योद्धा को भी हटाकर सर जेम्स आउट्रम को सेनापति बनाया गया। यह समाचार आते ही इसलिए हैवलॉक को बहुत बुरा लगा। जिस वैभव के लिए उसने जी-जान से परिश्रम किया था उस लखनऊ मुक्ति का वैभव ऐन समय पर दूसरे के हाथ पड़ेगा, इस अपमान से उसे बहुत उदासी हुई। फिर भी मैलसन लिखता है—“मनोभंग से उपजे उद्वेग ने मन को कितना ही निराश किया, तो भी कर्तव्य-निर्वाह में अणु मात्र भी कसर न करने का गुण अंग्रेजी राष्ट्र का भूषण है। अंग्रेजी मन के सारे विकार कर्तव्य बुद्धि के अधीन होते हैं। अन्याय-उपेक्षा को भोगते हुए अंग्रेजी मन चाहे जितना व्याकुल होता हो, फिर भी उसका राष्ट्र उसकी शक्तियों को हमेशा नियंत्रित करता रहता है। अपने राष्ट्र की उत्तम सेवा किस तरह करें, इस संबंध में उसका व्यक्तिगत मत कुछ भी क्यों न हो, परंतु जब सरकार का यार उस राष्ट्र का मत उसके मत से भिन्न हो तो अपना निजी मत एक तरफ रख देशसत्ता के आदेश की जैसी भी विजय हो, उधर ही अंग्रेज दिन-रात लगा रहता है। नील ने ऐसा ही उदात्त व्यवहार किया और अब हैवलॉक ने भी ऐसा ही उदात्त वर्तन किया। उसके सिर से भावी विजय का मुकुट छीन लिया गया तब भी दूसरे को श्रेय देनेवाली विजय के लिए वह पहले जैसा ही दिन-रात परिश्रम करने में जुट गया।”¹³¹

जिस विजय का सेहरा दूसरे के सिर बंधना है उस विजय के लिए केवल राष्ट्रीय कर्तव्य जान दिन-रात प्रयास करने में हैवलॉक लगा था, तब ही दिनांक 15 सितंबर को सर जेम्स आउट्रम के हाथ नेतृत्व में आते ही उसने जो पहला आदेश जारी किया वह यह था—“जिस वीर पुरूष ने लखनऊ मुक्त करने के लिए आज तक अप्रतिम शौर्य प्रकट किया है उस पुरूष को ही उसे मुक्त करने का सौभाग्य मिलना न्याय है, इसलिए अपने

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¹³¹ मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 346 ।