१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरास्ते से हैवलॉक की सेना रेसीडेंसी की ओर निकली है, यह ज्ञात होते ही विद्रोहियों की ओर से तोपों की जबरदस्त मार चालू हो गई। आलमबाग से शत्रु की इस मार को सहन करते अंग्रेज बड़ी दृढ़ता से बढ़ते हुए चारबाग के पुल तक आकर भिड़ गए। इस पुल को पार करते ही लखनऊ में प्रवेश होने से उस महत्त्वपूर्ण नाके पर दोनों पक्षों में घमासान होने लगा। मॉड द्वारा पुल के विद्रोहियों पर तोप-गोलों की मार आधे घंटे से चालू रखने पर भीवह पुल न तो खाली हो रहा था और न उसपर की तोपें ही बंद हो रही थी। इतना ही नहीं, अंग्रेजों के इक्कीस जवान यलो हाएस पर और कितने ही इस पुल के सामने पहले ही ढेर हो गए थें सारी अंग्रेजी सेना इस एक पुल की धौंस में वहीं खड़ी रहे क्या? पास ही खड़े हैवलॉक के युवा पुत्र से मॉड ने कहा-"युवा वीर, इसका कोई तो तोड़ निकालो!" यह सुनते ही वह युवा हैवलॉक नील के पास आया और बोला-तोप की मार की विद्रोही परवाह नहीं कर रहे तो उस पुल पर हमला करने का आदेश दें। पर आउट्रम से पूछे बिना मैं ऐसा आदेश नहीं दे सकता, यह जनरल नील कहने लगा। ऐसे में क्या किया जाए? तरुण हैवलॉक को उस प्रश्न का उत्तर तत्काल मिल गया। उसने अपना घोड़ा बढ़ाया। जहां मुख्य कमांडर हैवलॉक खड़ा था, उस दिशा की ओर उसने घोड़ा दौड़ाया। जहां मुख्य कमांडर हैवलॉक खड़ा था, उस दिशा की ओर उसने घोड़ा बढ़ाया। जहां मुख्य कमांडर से मिला हो-ऐसा बहाना बना वह नील के पास वापस आया। नील को झुककर सलाम करते हुए उस युवा हैवलॉक ने कहा-"सर, पुल पर हमला करने का निश्चय हुआ है।" यह सुनते ही जनरल नील ने आक्रमण का आदेश दिया। पच्चीस अंग्रेजों की पहली टुकड़ी लेकर स्वयं तरुण हैवलॉक पुल की ओर उबल पड़ा। भयानक घमासान का समय! उन पच्चीस लोगों में से एक दो मिनटों में ही कौन जीवित बचा? और तू तरुण हैवलॉक, तू बच-बच! एक शूर निडर स्वातंत्र्य वीर उस पुल पर कूद रहा है और उसके हाथ की वह बंदूक सीधे तुझपर ही निशाना साध रही है। यह शूर सिपाही तरुण हैवलॉक से दस गज पर आकर खड़ा हो गया और अंग्रेजी योद्धाओं के सीने के सामने अटल खड़े रहकर उसने हैवलॉक पर गोली चलाई-आधे इंच का अंतर! हैवलॉक के सिर में घुसने की जगह वह उसकी टोपी में घुसकर रह गई। फिर भी साहसी सिपाही, अनेक आंग्ल बंदूकें उसपर तनी होते हुए भी पीछे हटना छोड़ वहीं अटल खड़ा होकर गोली भरने लगा। वाह रे बहादुर! अंत में स्वतंत्रता समर में हैवलॉक की गोली से वीरोचित मृत्यु मरा। पल-दो पल बाद ही अंग्रेजी सेना-सागर धड़धड़ाता उस पुल को ही कंपित कर गया। विद्रोही पीछे हटते और अंग्रेज आगे बढ़ते निकले। पुल हारा। लखनऊ का पहला रास्ता साफ हुआ। दूसरा हुआ, तीसरा हुआ, अंग्रेजी सेना चली आगे घुसते, दो-चार कदम चली कि फिर तलवार, बंदूकों-पर-बंदूकें छूटने लगीं। रक्त की तलैया भर जाती तो फिर वह जीवित लड़ाई आगे बढ़ती। संध्या हो गई तो उसकी भयंकर गति में असंख्य ठोकरें लगने लगीं-
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