१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसैनिक, बीस तोपें छोड़ यमुना उतरते ही वे तुरंत कानपुर पर हमला करने नहीं गए। लखनऊ में विद्रोहियों से सर कोलिन की लड़ाई शुरू होने और यह ज्ञात हो जाने कर कि सर कोलिन वहां पूरी तरह फंस गया है, तात्या कानपुर के आसपास मंडराते रहे। लखनऊ में सर कोलिन अब कुछ दिन विद्रोहियों से उलझा रहेगा, यह दिखते ही तात्या शिवराजपुर तक चढ़ आए। रास्ते में सैनिक महत्त्व के स्थानों पर उन्होंने सेना के थान बनाए। नवंबर की तारीख को इतनी व्यवस्था करके तात्या ने अंग्रेजी रसद का मुख्य रास्ता बंद कर दिया। तात्या के इन दांव-पेचों का अर्थ विंडहम की नजर में आए बिना न रहा। उसने कलकत्ता से आ रही गोरी सेना के प्रवाह को कानपुर में ही रोके रखा। कार्थ्यू के अधीन सेना देकर उसे कालपी के पास रखा और तात्या सर कोलिन की पीठ पर मार करने जाता है या कानपुर आता है, इसकी राह देखता रहा। परंतु विंडहम बैठकर राह देखनेवाला योद्धा नहीं था। उसका बहादुर स्वभाव उसे युद्ध हेतु निरंतर आगे ढकेल रहा था। अंग्रेजों की हिंदुस्थान ही नहीं, पूरे एशिया की सेना के विषय में जो एक सैनिक धारणा थी उसके मन पर उसकी छाप भी थी। यह धारण कि 'एशियाटिक लोगों को हराने की उत्तम युक्ति है उनपर सीधे हमला कर देना। कोई चाहे जितना सशक्त हो, परंतु किंचित भी पैर पीछे लिया या देर की तो एशियाटिक लोग गर्व से फूल जाते हैं। किंतु कितना भी अशक्त हो, पर पीछे न हटते हुए तेजी से उनपर टूट पड़े तो एशियाटिक लोगों की आंखें कितना चौंधिया जाती हैं औ वे घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं।' इस सैन्य धारणा का उपयोग आज तक अंग्रेजों ने कितनी ही बार किया और अधिकतर वे सफल रहे। और चूंकि एशियाटिक लोगों से लड़ते हुए वास्तविक बल से अधिक उसके दिखावे में सफलता की संभावना अधिक रहती है, इसलिए युद्ध में गोरी मुट्ठी भर सेना हो तो भी वह सीधे तीर की तरह एशियाटिक लोगों पर हमला करती रहे और उनका आक्रमण होने के पहले ही आप उनपर आक्रमण कर हमारी शक्ति अधिक है, ऐसे उनका डराते रहें। यह आंग्ल युद्ध शस्त्र का एक प्रयोगसिद्ध नियम ही बन गया था। जो भी अंग्रेजी सोल्जर यहां आता, वह यह नियम कंठस्थ करता और जो अंग्रेजी इतिहासकार ग्रंथ लिखता वह इस नियम का सिद्धांत बार-बार लिखता था। ऐसी शिक्षा पाया जनरल विंडहम तात्या टोपे की हलचलों को मन माफिक चलने देकर राह देखता बैठनेवाला नहीं था। उसने कानपुर शहर से निकल कालपी के बाजू की नहर के पुल तक हमला किया। अंग्रेजी सेना की गतिविधि देखकर विद्रोहियों की सेना ने भी हलचल प्रारंभ की। उनकी सेना अकबरपुर से सुखंडी आ गई और सुखंडी से 25 नवंबर को पांडु नदी तक आकर भिड़ गई। अपने इतने पास तक साहसी शत्रु के आ जाने की सूचना मिलने से विंडहम की सेना में लड़ाई की तैयारी शुरू हो गई और एशियाटिक लोगों को हराने की रामबाण युक्ति 26 नवंबर को अपनाने की योजना बनी। विद्रोहियों पर स्वयं होकर ही सीधे आक्रमण कर पहले उनका सामना पीटा जाए और फिर ऐसे अकेले-अकेले पकड़ अन्य हिस्सों को भी नष्ट कर दिया जाए, यह सकंल्प कर विंडहम तारीख 26 को 1857 का स्वातंत्र्य समर – 309